नमस्कार मित्रों,
आज एक बहुत ही अच्छी कहानी पढ़ी मैंने | इसे पढ़कर मुझे कविता लिखने का मन किया सो मैंने एक कविता लिखी है | मूल विचार मेरे नहीं हैं किन्तु इसे कविता के रूप में ढालने का प्रयास किया है| कहानी को भी कविता के बाद संलग्न किया है ताकि आप उसका भी आनंद ले सकें |
तो लीजिये आप के लिए -
हम गुस्से में चिल्लाते क्यूँ हैं ?
सोचा है क्या तुमने हम गुस्से में आपा खोते क्यूँ हैं,
जो चाहें मीठे फल पाना तो हम कांटे बोते क्यूँ हैं ?
अपने गुस्से को चीखों से, शोरों से, बतलाते क्यूँ हैं ,
पास खडा हो व्यक्ति फिर भी हम उस पर चिल्लाते क्यूँ हैं ?
जब दिल से दिल की दूरी इतनी ज्यादा बढ़ जाती है,
तब आवाजों के पावों में जैसे बेडी पड़ जाती है ,
बिन चीखे, जो सामने तक, नहीं पहुँचता सार है ,
लेता जनम चीत्कार तब जब टूट जाता प्यार है |
वहीँ, जहाँ दो दिल मिले बैठें, शोरों की दरकार कहाँ है ?
मौन बात हो, समझ साथ हो, तो चीखें चीत्कार कहाँ है ?
होती बात निगाहों में ही, हों आखें जो चार तो क्या है ?
और बात होठों से निकले बिन जो हो स्वीकार तो क्या है ?
रखना इसे तुम ध्यान में की दिल की दूरी दूर हो,
ना दोस्ती फिर टूटने को, फिर कोई, मजबूर हो.....
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Original Story-
A saint asked his disciples, 'Why do we shout in anger? Why do people shout at each other when they are upset?'
Disciples thought for a while, one of them said, 'Because we lose our calm, we shout for that.'
'But, why to shout when the other person is just next to you?' asked the saint.
'Isn't it possible to speak to him or her with a soft voice? Why do you shout at a person when you're angry?'
Disciples gave some other answers but none satisfied the saint.
Finally he explained, 'When two people are angry at each other, their hearts distance a lot. To cover that distance they must shout . More the angry, more the distance between hearts & louder you should shout to cover the distance & reach him.
Then the saint asked, 'What happens when two people fall in love? They don't shout at each other but talk softly, why? Because their hearts are very close. The distance between them is very small....' They do not speak, only whisper and they get even closer to each other in their love. Finally they even need not whisper, they only look at each other and that's all. That is how close two people are when they love each other.'
MORAL: When you argue, do not let the hearts go far away & do not say words that keeps the distance of each other more, else there will come a day when the distance is so great that you will not find the path to return.
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Thursday, April 2, 2009
Monday, October 13, 2008
मेट्रीमोनी
एक दिन अकस्मात् , हो गई दासजी से मुलाकात,
हमने कहा कैसे हैं सर,
उन्होंने कहा क्या सुनाएँ ख़बर ?
तीस साल से हैं अमरीका ,
रहन सहन इस देश का सीखा,
कटी जवानी डॉलर पीछे ,
काम किया बस आँखें मींचे ,
दया प्रभु की सब है चंगा ,
बस जीवन में अब एक पंगा,
बड़ी कार , बड़ा बैंक बैलेंस , बड़ी सोसाइटी में घर है,
चाहिए तो बस बेटे को एक बहू और बेटी को एक वर है ,
हमने कहा - अजी ! टेक्नोलोजी का लाभ उठाइए ,
शादी डॉट कॉम पर जाइये ,
उन्होंने हमें घूरा , फिर कहा ,
हमने बहुत है खर्च किया ,
सारे साइटों पर सर्च किया ,
पर अपने तो भाग ही फूटे हैं ,
वहां तो आधे नाम ही झूठे हैं !
हाँ , एक आध सच्चे भी हैं,
हम से सीरियस , अच्छे भी हैं |
हमने बात करी, फोटो आए ,
हमने घर सबको दिखलाये,
बेटी यहीं जो पली बढ़ी ,
हर फोटो पे उसकी नाक चढी ,
हुई खुशी मैं सीना तान गया ,
चलो बेटा किसीपे मान गया ,
पर देखा जो मैंने फोटो दिल ऐसा मेरा धड़का था,
की मेरी फ्यूचर बहू रानी एक लड़की नहीं एक लड़का था ,
कोई बताये हमको ये आज,
ये कब बदला अपना समाज ,
य एरंग नया, वो संग नया,
अब जीने एक तो ढंग नया...
चलो बेटी की बताते हैं..
एक मित्र के सुपुत्र का बेटी को रिश्ता आया था,
फिर जुड़ जायेंगे भारत से ये सोचक के मन हर्षाया था,
फ्यूचर समधन से बोले हम ,
अब मिट जायेंगे सारे गम,
मेरी बेटी को अब तो अपनों का लाड मिलेगा,
वो पूछीं मेरे बेटे को कब तक ग्रीन कार्ड मिलेगा ?
मिस्टर दस थे बड़े उदास ,
टेंशन में सुबहो शाम थे,
निज देश त्याग , परदेस में
रहने के ये कुछ इनाम थे,
मिस्टर दास का सुनकर हाल कलेजा मेरा हिल गया ,
जो पहुँची मैं दफ्तर , एक मित्र भारतीय मिल गया ,
नाम तो उसका शान था,
हरदम रहता परेशान था,
जो मैंने सुनाई उसको दासजी की कथा ,
लगा सुनाने वो भी अपनी शादी की दारुण व्यथा !
उनका क्या सुनती हो ? हमारा सुनो ..
तुम सुनो तो मेरा हाल,पिछले तीन साल ..
एक बस एक भारतीय कन्या के लिए
बीन बजा रहा हूँ, सपने सजा रहा हूँ,
राग मल्हार गा रहा हूँ,
और रोटी के अभाव में पिजा खा रहा हूँ !
पर ये इंडियन लड़कियां इतनी कसाई हैं ,
की इनके लिए हम तो बकरे के भाई हैं ,
जितने हमारे सर पर बाल हैं,
उससे भी ज़्यादा उनके सवाल हैं ,
एक ने पूछा क्या है वीसा ,एक ने पूछा क्या है pay ?
सान फ्रांसिस्को में रहते हो, I hope you are not a gay !
एक ने पूछा स्टॉक हैं ? या रियल इस्टेट में डाला है?
या अब तक अपने तनखे से बस ख़ुद ही को पाला है?
क्या क्या कहूँ सवाल थे सारे , भाग गया मैं डर के मारे..
जो पूछेंगी ये लड़कियां इतने सवाल तकनीकी,
तो देखूँगा लड़की मैं - रुसी, चीनी , अमरीकी...
जाने इंडियन गर्ल्स को क्या हो गया है ?
इनकी शरम, इनका धरम कहाँ खो गया है?
हमारा मित्र भारतीय नारी के अभिमान को रो रहा था ,
हमें गर्व हो रहा था, बहुत गर्व हो रहा था !
फिर भी हिम्मत देने को हमने बोला,
लड़की educated है बम का गोला ..
कम पढ़ी लिखी भोली भाली कहो तो ढूंढ के लाऊँ ,
जो कहे पति को परमेश्वर , मैं तुमको दिखलाऊँ,
वो चीखा - नह्ह्ह्ह्हीं !
बीवी की मार तो सह लूँगा पर मंहगाई कैसे सहूँ ?
सिलिकन वेल्ली में रहना है तो हरदम यही कहूँ ...
बेशक लंगडी लूली हो कोई फियर नहीं है ,
वो भी क्या दुल्हन जो इंजीनियर नहीं है ?
इंजीनियर न सही , डॉक्टर ही सही,
दो तनखा के बिना तो गुजर डियर नहीं है !
हम लगे हुए थे बातों में,
ले कागज़ कुछ हाथों में ,
आई तमन्ना कुछ कहने ,
बड़े तंग कपड़े पहने....
जो निचे से कुछ ऊपर थे ,
और ऊपर से कुछ नीचे !
जी हाँ , बॉलीवुड ने हॉलीवुड को छोड़ दिया है पीछे !
मैंने कहा शान , मेरी बात मान,
घर की मुर्गी धर ले,
तू तमन्ना से ही शादी करले ,
शान तो चुप रहा पर तमन्ना बोली,
ये कैसी बातें खोली ?
शादी तो शादी है, कोई फास्ट फ़ूड नहीं है ,
वैसे भी शादी का मेरा मूड नहीं है !
लेकिन अगर तुम्हारा मित्र मेरा आधा किराया सह सकता है ,
तो मेरे साथ मेरे घर पर रह सकता है ...
बात साथ रहने कि ही है , शादी का क्या तर्क है ?
ऐसे रहें या वैसे , कोई फर्क है?
जी में आया दी चाटें में जड़ दूँ इसको आज,
पर ये नही तमन्ना , ये तो कह रहा है समाज !
घर घर में आज डिवोर्स हो रहे हैं !
स्कूल में सेक्स पर कोर्स हो रहे हैं ,
इराक में यू एस का फाॅर्स ढो रहे हैं,
और सारे प्रोजेक्ट इंडिया आउट सोर्स हो रहे हैं !
अंत में एक मंगल कामना के साथ विदा लेती हूँ-
अर्चना है यही कि भारतीय चेतना आपके करों में हो ,
आपकी या आपके बच्चों कि शादी अच्छे घरों में हो !
आप इस कविता की विडियो यहाँ देख सकते हैं -
http://www.youtube.com/watch?v=7kJ7nuV8wJc
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हमने कहा कैसे हैं सर,
उन्होंने कहा क्या सुनाएँ ख़बर ?
तीस साल से हैं अमरीका ,
रहन सहन इस देश का सीखा,
कटी जवानी डॉलर पीछे ,
काम किया बस आँखें मींचे ,
दया प्रभु की सब है चंगा ,
बस जीवन में अब एक पंगा,
बड़ी कार , बड़ा बैंक बैलेंस , बड़ी सोसाइटी में घर है,
चाहिए तो बस बेटे को एक बहू और बेटी को एक वर है ,
हमने कहा - अजी ! टेक्नोलोजी का लाभ उठाइए ,
शादी डॉट कॉम पर जाइये ,
उन्होंने हमें घूरा , फिर कहा ,
हमने बहुत है खर्च किया ,
सारे साइटों पर सर्च किया ,
पर अपने तो भाग ही फूटे हैं ,
वहां तो आधे नाम ही झूठे हैं !
हाँ , एक आध सच्चे भी हैं,
हम से सीरियस , अच्छे भी हैं |
हमने बात करी, फोटो आए ,
हमने घर सबको दिखलाये,
बेटी यहीं जो पली बढ़ी ,
हर फोटो पे उसकी नाक चढी ,
हुई खुशी मैं सीना तान गया ,
चलो बेटा किसीपे मान गया ,
पर देखा जो मैंने फोटो दिल ऐसा मेरा धड़का था,
की मेरी फ्यूचर बहू रानी एक लड़की नहीं एक लड़का था ,
कोई बताये हमको ये आज,
ये कब बदला अपना समाज ,
य एरंग नया, वो संग नया,
अब जीने एक तो ढंग नया...
चलो बेटी की बताते हैं..
एक मित्र के सुपुत्र का बेटी को रिश्ता आया था,
फिर जुड़ जायेंगे भारत से ये सोचक के मन हर्षाया था,
फ्यूचर समधन से बोले हम ,
अब मिट जायेंगे सारे गम,
मेरी बेटी को अब तो अपनों का लाड मिलेगा,
वो पूछीं मेरे बेटे को कब तक ग्रीन कार्ड मिलेगा ?
मिस्टर दस थे बड़े उदास ,
टेंशन में सुबहो शाम थे,
निज देश त्याग , परदेस में
रहने के ये कुछ इनाम थे,
मिस्टर दास का सुनकर हाल कलेजा मेरा हिल गया ,
जो पहुँची मैं दफ्तर , एक मित्र भारतीय मिल गया ,
नाम तो उसका शान था,
हरदम रहता परेशान था,
जो मैंने सुनाई उसको दासजी की कथा ,
लगा सुनाने वो भी अपनी शादी की दारुण व्यथा !
उनका क्या सुनती हो ? हमारा सुनो ..
तुम सुनो तो मेरा हाल,पिछले तीन साल ..
एक बस एक भारतीय कन्या के लिए
बीन बजा रहा हूँ, सपने सजा रहा हूँ,
राग मल्हार गा रहा हूँ,
और रोटी के अभाव में पिजा खा रहा हूँ !
पर ये इंडियन लड़कियां इतनी कसाई हैं ,
की इनके लिए हम तो बकरे के भाई हैं ,
जितने हमारे सर पर बाल हैं,
उससे भी ज़्यादा उनके सवाल हैं ,
एक ने पूछा क्या है वीसा ,एक ने पूछा क्या है pay ?
सान फ्रांसिस्को में रहते हो, I hope you are not a gay !
एक ने पूछा स्टॉक हैं ? या रियल इस्टेट में डाला है?
या अब तक अपने तनखे से बस ख़ुद ही को पाला है?
क्या क्या कहूँ सवाल थे सारे , भाग गया मैं डर के मारे..
जो पूछेंगी ये लड़कियां इतने सवाल तकनीकी,
तो देखूँगा लड़की मैं - रुसी, चीनी , अमरीकी...
जाने इंडियन गर्ल्स को क्या हो गया है ?
इनकी शरम, इनका धरम कहाँ खो गया है?
हमारा मित्र भारतीय नारी के अभिमान को रो रहा था ,
हमें गर्व हो रहा था, बहुत गर्व हो रहा था !
फिर भी हिम्मत देने को हमने बोला,
लड़की educated है बम का गोला ..
कम पढ़ी लिखी भोली भाली कहो तो ढूंढ के लाऊँ ,
जो कहे पति को परमेश्वर , मैं तुमको दिखलाऊँ,
वो चीखा - नह्ह्ह्ह्हीं !
बीवी की मार तो सह लूँगा पर मंहगाई कैसे सहूँ ?
सिलिकन वेल्ली में रहना है तो हरदम यही कहूँ ...
बेशक लंगडी लूली हो कोई फियर नहीं है ,
वो भी क्या दुल्हन जो इंजीनियर नहीं है ?
इंजीनियर न सही , डॉक्टर ही सही,
दो तनखा के बिना तो गुजर डियर नहीं है !
हम लगे हुए थे बातों में,
ले कागज़ कुछ हाथों में ,
आई तमन्ना कुछ कहने ,
बड़े तंग कपड़े पहने....
जो निचे से कुछ ऊपर थे ,
और ऊपर से कुछ नीचे !
जी हाँ , बॉलीवुड ने हॉलीवुड को छोड़ दिया है पीछे !
मैंने कहा शान , मेरी बात मान,
घर की मुर्गी धर ले,
तू तमन्ना से ही शादी करले ,
शान तो चुप रहा पर तमन्ना बोली,
ये कैसी बातें खोली ?
शादी तो शादी है, कोई फास्ट फ़ूड नहीं है ,
वैसे भी शादी का मेरा मूड नहीं है !
लेकिन अगर तुम्हारा मित्र मेरा आधा किराया सह सकता है ,
तो मेरे साथ मेरे घर पर रह सकता है ...
बात साथ रहने कि ही है , शादी का क्या तर्क है ?
ऐसे रहें या वैसे , कोई फर्क है?
जी में आया दी चाटें में जड़ दूँ इसको आज,
पर ये नही तमन्ना , ये तो कह रहा है समाज !
घर घर में आज डिवोर्स हो रहे हैं !
स्कूल में सेक्स पर कोर्स हो रहे हैं ,
इराक में यू एस का फाॅर्स ढो रहे हैं,
और सारे प्रोजेक्ट इंडिया आउट सोर्स हो रहे हैं !
अंत में एक मंगल कामना के साथ विदा लेती हूँ-
अर्चना है यही कि भारतीय चेतना आपके करों में हो ,
आपकी या आपके बच्चों कि शादी अच्छे घरों में हो !
आप इस कविता की विडियो यहाँ देख सकते हैं -
http://www.youtube.com/watch?v=7kJ7nuV8wJc
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Friday, September 5, 2008
चाँद - चकोर
किसी गुलसितां में चहकती थी हरदम ,
दो आंखों में उसकी महकती थी शबनम ,
सभी फूल पाती उसी पर फ़िदा थे ,
जो गूंजे सदा में उसी की सदा थे |
थी लाडो सभी की चहेती चकोर ,
कूदती भागती थी वो चारों ही ओर,
था मासूम दिल ऐसा , भोली सी सूरत ,
थी उसके लिए ये जहाँ खूबसूरत ,
एक दिन जो नज़र आसमां पर पड़ी ,
चाँद के चेहरे से उसकी आँखें लड़ी,
देखती ही रही कुछ भी बोले न वो ,
मुस्कुराये मगर राज़ खोले न वो ,
फिर कहा उसने ये बड़े दांव से,
चाँद ला दो मुझे आसमां गाँव से ,
सब हँसे चल रे पगली जिद नहीं ऐसे करते ,
कभी तारों को देखा ज़मीं पे उतरते,
अगर वो ज़मीं पे आ सकता नहीं ,
तो मैं क्यों न ख़ुद ही उस जाऊं वहीँ ,
यहीं तो दिखे है , उठाओ नज़र ,
हाथों से छूलूं , जो बढाऊं अगर ,
सब ये बोले जो दिखता है होता नहीं,
रेत के ढेर में पानी सोता नहीं ,
इश्क़ में कौन दुनिया में रोता नहीं ,
जो समझता है सपने पिरोता नहीं....
न मानी उडी उड़ चली वो चकोर ,
दोनों पंख खोले वो अम्बर की ओर ,
न दिन ही को देखा , न रातों को जाना,
न गर्मी न सर्दी, हवा का ठिकाना ,
जो टूटा बुलंदी से दम आखरी,
तो प्यासी वो आके ज़मीं पे गिरी ,
अपने उजडे पंखों को मींचे हुए
पहुँची प्यासी पोखर साँस खींचे हुए ,
देखा जो पानी में था चाँद एक,
आई जान वापस , दिया मौत फ़ेंक ,
गई वो समझ दुनिया दारी को आज ,
लो तुम भी सुनो उस चकोरी का राज़ ,
जो ख्वाइश करो तुम कभी चाँद की ,
अपने घर में पानी का घडा डालना ,
जो सच्ची हो चाहत झुके आसमां,
हमसफ़र दिल तुम ज़रा बड़ा पालना |
दो आंखों में उसकी महकती थी शबनम ,
सभी फूल पाती उसी पर फ़िदा थे ,
जो गूंजे सदा में उसी की सदा थे |
थी लाडो सभी की चहेती चकोर ,
कूदती भागती थी वो चारों ही ओर,
था मासूम दिल ऐसा , भोली सी सूरत ,
थी उसके लिए ये जहाँ खूबसूरत ,
एक दिन जो नज़र आसमां पर पड़ी ,
चाँद के चेहरे से उसकी आँखें लड़ी,
देखती ही रही कुछ भी बोले न वो ,
मुस्कुराये मगर राज़ खोले न वो ,
फिर कहा उसने ये बड़े दांव से,
चाँद ला दो मुझे आसमां गाँव से ,
सब हँसे चल रे पगली जिद नहीं ऐसे करते ,
कभी तारों को देखा ज़मीं पे उतरते,
अगर वो ज़मीं पे आ सकता नहीं ,
तो मैं क्यों न ख़ुद ही उस जाऊं वहीँ ,
यहीं तो दिखे है , उठाओ नज़र ,
हाथों से छूलूं , जो बढाऊं अगर ,
सब ये बोले जो दिखता है होता नहीं,
रेत के ढेर में पानी सोता नहीं ,
इश्क़ में कौन दुनिया में रोता नहीं ,
जो समझता है सपने पिरोता नहीं....
न मानी उडी उड़ चली वो चकोर ,
दोनों पंख खोले वो अम्बर की ओर ,
न दिन ही को देखा , न रातों को जाना,
न गर्मी न सर्दी, हवा का ठिकाना ,
जो टूटा बुलंदी से दम आखरी,
तो प्यासी वो आके ज़मीं पे गिरी ,
अपने उजडे पंखों को मींचे हुए
पहुँची प्यासी पोखर साँस खींचे हुए ,
देखा जो पानी में था चाँद एक,
आई जान वापस , दिया मौत फ़ेंक ,
गई वो समझ दुनिया दारी को आज ,
लो तुम भी सुनो उस चकोरी का राज़ ,
जो ख्वाइश करो तुम कभी चाँद की ,
अपने घर में पानी का घडा डालना ,
जो सच्ची हो चाहत झुके आसमां,
हमसफ़र दिल तुम ज़रा बड़ा पालना |
Thursday, September 4, 2008
गंगा मौसी !
धन्यवाद देती हूँ श्री शरद तैलंग जी को जिन्होंने इस कविता की खामियां निकाल कर इसे तराशा है | इस कविता की पूर्णता में शरदजी का बहुत बड़ा हाथ है |
धन्यवाद शरदजी !
किसी देश में नदी किनारे , था मेरा एक गाँव,
धेनु, धरा , धन, धाम प्रचुर था, थी पीपल की छाँव,
उसी गाँव में मेरी प्यारी गंगा मौसी रहती थी,
था कोई न रिश्ता उनसे, यूँ ही मौसी कहती थी ,
हर गर्मी में गाँव जो जाती मैं उनसे ही खेली थी,
मैं थी नौ की, बीस की वो थीं, मेरी वही सहेली थीं,
याद है मुझको वो गर्मी , मौसी की हुई सगाई थी ,
मेरी मौसी गाँव के सबसे ऊंचे घर में ब्याही थी,
स्वर्ण जडित गहनों में , मेरी मौसी रमा सरीखी थी ,
लेकिन जाने क्यों उनकी मुस्कान बहुत ही फीकी थी ?
अगली गर्मी की छुट्टी में मौसी घर लाला आया,
इक प्यासे के घर में जैसे अमृत का प्याला आया
अनपढ़ मौसी के कहने पर ही शिक्षा का फूल खिला .
उनकी शुभ दृष्टि से गाँव को प्रथम एक स्कूल मिला .
तब स्कूल में शिक्षक आए एक, ज्ञान से थे भरपूर,
अनुपम तेज था चेहरे पर , सब चिंताओं से वो थे दूर,
मौसी ने अपनी भी शिक्षा , बड़े शौक से करवाई
कितना रोई मैं जब, उनकी पहली चिट्टी घर आई
मेरी भी कॉलेज की अब , तैयारियां जोरों पे थी,
मेरी जैसे सालों की , प्रतियोगिता औरों से थी ,
अबकी गर्मी मौसी को पहचान नही मैं पाई थी,
कितनी आभा थी उनमें जब मुझसे मिलने आई थी ....
कुंदन जैसा रंग था उनका बालक सी थी चंचलता
रूप कमल सा खिला खिला और नैनों में थी संबलता l
मैंने पूछा मौसी से - क्या शिक्षा से ये पाया है?
वो मुस्काई, बोली -"पगली, मन में प्रेम समाया है" .
ज्ञान के ही सागर ने ,मेरे इस जीवन को है छुआ ,
पता नहीं कब, क्यों और कैसे, पर कुछ तो है अवश्य हुआ !
मैं चौंकी थी -"ओ मौसी ! तू भी तो बस ह्द करती है
धन्यवाद शरदजी !
किसी देश में नदी किनारे , था मेरा एक गाँव,
धेनु, धरा , धन, धाम प्रचुर था, थी पीपल की छाँव,
उसी गाँव में मेरी प्यारी गंगा मौसी रहती थी,
था कोई न रिश्ता उनसे, यूँ ही मौसी कहती थी ,
हर गर्मी में गाँव जो जाती मैं उनसे ही खेली थी,
मैं थी नौ की, बीस की वो थीं, मेरी वही सहेली थीं,
याद है मुझको वो गर्मी , मौसी की हुई सगाई थी ,
मेरी मौसी गाँव के सबसे ऊंचे घर में ब्याही थी,
स्वर्ण जडित गहनों में , मेरी मौसी रमा सरीखी थी ,
लेकिन जाने क्यों उनकी मुस्कान बहुत ही फीकी थी ?
अगली गर्मी की छुट्टी में मौसी घर लाला आया,
इक प्यासे के घर में जैसे अमृत का प्याला आया
अनपढ़ मौसी के कहने पर ही शिक्षा का फूल खिला .
उनकी शुभ दृष्टि से गाँव को प्रथम एक स्कूल मिला .
तब स्कूल में शिक्षक आए एक, ज्ञान से थे भरपूर,
अनुपम तेज था चेहरे पर , सब चिंताओं से वो थे दूर,
मौसी ने अपनी भी शिक्षा , बड़े शौक से करवाई
कितना रोई मैं जब, उनकी पहली चिट्टी घर आई
मेरी भी कॉलेज की अब , तैयारियां जोरों पे थी,
मेरी जैसे सालों की , प्रतियोगिता औरों से थी ,
अबकी गर्मी मौसी को पहचान नही मैं पाई थी,
कितनी आभा थी उनमें जब मुझसे मिलने आई थी ....
कुंदन जैसा रंग था उनका बालक सी थी चंचलता
रूप कमल सा खिला खिला और नैनों में थी संबलता l
मैंने पूछा मौसी से - क्या शिक्षा से ये पाया है?
वो मुस्काई, बोली -"पगली, मन में प्रेम समाया है" .
ज्ञान के ही सागर ने ,मेरे इस जीवन को है छुआ ,
पता नहीं कब, क्यों और कैसे, पर कुछ तो है अवश्य हुआ !
मैं चौंकी थी -"ओ मौसी ! तू भी तो बस ह्द करती है
अपनों को तो छोड़ दिया अब तू गैरों पे मरती है !
तू भगिनी, तनया भार्या है, तू ममता है, जाया है
फिर राधा मीरा के जैसा, कैसा रूप बनाया है?
वो बोली- मेरा विवेक न जाने भाव में कहाँ खो गया ?
मैंने तो कुछ किया नहीं, बस ये तो अपने आप हो गया !
पर मेरे ये संस्कार हैं , मर्यादा न छोडूंगी
अपने कर्तव्यों से भी मैं, कभी नहीं मुंह मोडूंगी
पर बतलाओ क्या खुशियों पर मेरा कुछ अधिकार नहीं?
कैसा नीरस बोझिल जीवन, जिसमे सच्चा प्यार नहीं..
मैंने सोचा देखूं मौसी की क्यों ऐसी मति हुई ?
और प्रेम के मार्ग पर उसकी , आज कहाँ तक गति हुई ?
अगले दिन देखा जब शिक्षक आए , उन्हें पढाने भाषा ,
देख रही थी मैं उनमें थी , भरी हुई अद्भुत अभिलाषा ,
इक मोटा सा परदा उन दोनों के बीच में तना खड़ा-
हया शर्म संकोच का पहरा- उस से भी था बहुत बड़ा !
देख रहे थे इक- दूजे को, फिर भी कैसे तृष्ण रहे-!
मेरे आगे मानो जैसे स्वयम ही राधा कृष्ण रहे .
ऐसी निर्मल प्रेम कथा को जाने किसकी नज़र लगी-?
प्रेम की दुश्मन दुनिया बन गई , उसको ये जब ख़बर लगी .
मौसी की आजादी पर फिर पाबंदों की पाश मिली,
तू भगिनी, तनया भार्या है, तू ममता है, जाया है
फिर राधा मीरा के जैसा, कैसा रूप बनाया है?
वो बोली- मेरा विवेक न जाने भाव में कहाँ खो गया ?
मैंने तो कुछ किया नहीं, बस ये तो अपने आप हो गया !
पर मेरे ये संस्कार हैं , मर्यादा न छोडूंगी
अपने कर्तव्यों से भी मैं, कभी नहीं मुंह मोडूंगी
पर बतलाओ क्या खुशियों पर मेरा कुछ अधिकार नहीं?
कैसा नीरस बोझिल जीवन, जिसमे सच्चा प्यार नहीं..
मैंने सोचा देखूं मौसी की क्यों ऐसी मति हुई ?
और प्रेम के मार्ग पर उसकी , आज कहाँ तक गति हुई ?
अगले दिन देखा जब शिक्षक आए , उन्हें पढाने भाषा ,
देख रही थी मैं उनमें थी , भरी हुई अद्भुत अभिलाषा ,
इक मोटा सा परदा उन दोनों के बीच में तना खड़ा-
हया शर्म संकोच का पहरा- उस से भी था बहुत बड़ा !
देख रहे थे इक- दूजे को, फिर भी कैसे तृष्ण रहे-!
मेरे आगे मानो जैसे स्वयम ही राधा कृष्ण रहे .
ऐसी निर्मल प्रेम कथा को जाने किसकी नज़र लगी-?
प्रेम की दुश्मन दुनिया बन गई , उसको ये जब ख़बर लगी .
मौसी की आजादी पर फिर पाबंदों की पाश मिली,
विद्या के विद्याधर की पटरी के ऊपर लाश मिली,
याद मुझे है आज भी वो दिन, जब मेरा कौतुक जागा
याद मुझे है आज भी वो दिन, जब मेरा कौतुक जागा
सारा गाँव न्याय करने को था पचांयत में लागा !
कहलाई थी गंगा मौसी, कुलक्षनी , डायन कुलटा,
कहलाई थी गंगा मौसी, कुलक्षनी , डायन कुलटा,
एक सीता समान नारी का, भाग्य हाय कैसा पलटा ?
फिर पंचों ने सोच समझ कर एक फ़ैसला था तोला ,
सब हो माफ़ तुझे जो "माफ़ी मांगे" , सबने ये बोला
मौसी ने जो कहा वहाँ - सब गाँव उसी से था गूंजा,
प्रेम किया है स्वच्छ हृदय से , ये ही बस मेरी पूजा,
चोरी नहीं , डकैती न की , नहीं दिखाई शक्ति है,
मर्यादा न तोडी है , ये मात्र हृदय की भक्ति है !
क्षमा जो मांगूंगी तो मेरा प्रेम यहाँ लज्जित होगा ,
इसकी खातिर मृत्यु भी आए , अंत मेरा सज्जित होगा ।
क्या अपराध ? दोष क्या मेरा ? , इससे किसको है हानि ?
फिर पंचों ने सोच समझ कर एक फ़ैसला था तोला ,
सब हो माफ़ तुझे जो "माफ़ी मांगे" , सबने ये बोला
मौसी ने जो कहा वहाँ - सब गाँव उसी से था गूंजा,
प्रेम किया है स्वच्छ हृदय से , ये ही बस मेरी पूजा,
चोरी नहीं , डकैती न की , नहीं दिखाई शक्ति है,
मर्यादा न तोडी है , ये मात्र हृदय की भक्ति है !
क्षमा जो मांगूंगी तो मेरा प्रेम यहाँ लज्जित होगा ,
इसकी खातिर मृत्यु भी आए , अंत मेरा सज्जित होगा ।
क्या अपराध ? दोष क्या मेरा ? , इससे किसको है हानि ?
क्या है ये अपराध अदम्य ,जो कही प्रेम की है बानी !
मीरा के गुण गाते हो तुम, राधा की करते पूजा
मीरा के गुण गाते हो तुम, राधा की करते पूजा
अपने ही आँगन में क्यों व्यवहार किया करते दूजा ?
तुमने तो व्यापार बनाया सब भावुक संबंधों को
हर रिश्ते के साथ बाँध कर इन झूठे अनुबंधों को
आज तुम्हें मैं जगा सकूं तो स्वयं आज मैं जागूंगी.
माफ़ करें , पर प्रेम की खातिर मैं माफ़ी न मांगूंगी !
जिसने चाहा ये समाज जागे , ख़ुद वो ही सो गई,
पर मर कर भी मौसी मेरी अमर सदा को हो गई !!!!
Thursday, May 8, 2008
Pareeksha_ परीक्षा
परीक्षा
( मुशी प्रेमचंद की कहानी 'परीक्षा' पर आधारित )
जब सुजानगढ़ का दीवान उमर से थका चला था ,
सोचा की मैं स्वयं चुनूं , दीवान नया भला सा ,
हुई घोषणा , पूर्ण राज्य में होगा चुनाव दीवान का,
परिचय होगा, सब गुनियों के ,आन -बाण और शान का,
हर कोने से आए सज्जन लेकर अपने रंग ,
सबका अपना अलग रवैया ,अपना अपना ढंग ,
कोई खेल में अव्वल था , कोई सुर में उस्ताद ,
कोई ज्ञान का सागर था कोई गुण से आबाद ,
मुश्किल यूँ था चुन ना उनमें ज्यों पर्वत से जीरा ,
बूढा जौहरी ढूंढ रहा था पर मोती में हीरा !
एक दिवस सब युवा जनों ने सोचा खेलें खेल ,
सम्भव हो जाए उसी से आकांक्षा से मेल,
हुई आरम्भ प्रतियोगिता फिर हार जीत के साए,
अंत में थक हार कर सब अपने घर को आए,
रस्ते में एक बूढा किसान बिनती करता था सबसे ,
गाड़ी उसकी एक दलदल में फंसी हुई थी कबसे ...
रुके कोई क्यों ऐसे पल में थके हुए थे सब ही ,
लगता था आराम मिले सो जायें बस अब ही,
बैठ गया वो बूढा पकड़े अपना सर हाथों में ,
ऐसे में देखा उसको एक लड़के ने बातों में ,
जाना जो उसकी मुश्किल बोला की मैं आता हूँ ,
लगी पाँव में चोट है मेरे साथी को लाता हूँ |
जब कोई न आया , वो बोला हंसके तब ,
हम दोनों को ही मिलके करना पड़ेगा अब,
आधी रात गए वो लड़का उस बूढे के साथ ,
खींच रहा था गाड़ी उसकी कसके दोनों हाथ ,
भवन जो पहुँचा सोने को , बीती रात थी सारी,
सब सज्जन निकले थे सुन ने निर्णय की तैयारी..
दौड़ा पहुँचा जो कक्ष में निर्णय होना था तब ही ,
दिल को थामे बैठे लोग आशावादी थे सब ही,
चुना गया वो लड़का जो बैठा सबसे पीछे ,
करने लगे प्रश्न लोग , अपनी मुट्ठी भींचे ,
आया वो बूढा किसान तब, अरे वो ही दीवान है !
बोला उसने कठिन क्षणों में इंसा की पहचान है ...
जिस मानव ने औरों के दुःख को अपना जाना है ,
उसी वीर हृदय को हमने परिषद् में लाना है ,
चाहे कितने गुण हों किसी में , वृथा हैं सारे मान ,
करे जो न दीन दुखी और मेहनत का सम्मान !
( मुशी प्रेमचंद की कहानी 'परीक्षा' पर आधारित )
जब सुजानगढ़ का दीवान उमर से थका चला था ,
सोचा की मैं स्वयं चुनूं , दीवान नया भला सा ,
हुई घोषणा , पूर्ण राज्य में होगा चुनाव दीवान का,
परिचय होगा, सब गुनियों के ,आन -बाण और शान का,
हर कोने से आए सज्जन लेकर अपने रंग ,
सबका अपना अलग रवैया ,अपना अपना ढंग ,
कोई खेल में अव्वल था , कोई सुर में उस्ताद ,
कोई ज्ञान का सागर था कोई गुण से आबाद ,
मुश्किल यूँ था चुन ना उनमें ज्यों पर्वत से जीरा ,
बूढा जौहरी ढूंढ रहा था पर मोती में हीरा !
एक दिवस सब युवा जनों ने सोचा खेलें खेल ,
सम्भव हो जाए उसी से आकांक्षा से मेल,
हुई आरम्भ प्रतियोगिता फिर हार जीत के साए,
अंत में थक हार कर सब अपने घर को आए,
रस्ते में एक बूढा किसान बिनती करता था सबसे ,
गाड़ी उसकी एक दलदल में फंसी हुई थी कबसे ...
रुके कोई क्यों ऐसे पल में थके हुए थे सब ही ,
लगता था आराम मिले सो जायें बस अब ही,
बैठ गया वो बूढा पकड़े अपना सर हाथों में ,
ऐसे में देखा उसको एक लड़के ने बातों में ,
जाना जो उसकी मुश्किल बोला की मैं आता हूँ ,
लगी पाँव में चोट है मेरे साथी को लाता हूँ |
जब कोई न आया , वो बोला हंसके तब ,
हम दोनों को ही मिलके करना पड़ेगा अब,
आधी रात गए वो लड़का उस बूढे के साथ ,
खींच रहा था गाड़ी उसकी कसके दोनों हाथ ,
भवन जो पहुँचा सोने को , बीती रात थी सारी,
सब सज्जन निकले थे सुन ने निर्णय की तैयारी..
दौड़ा पहुँचा जो कक्ष में निर्णय होना था तब ही ,
दिल को थामे बैठे लोग आशावादी थे सब ही,
चुना गया वो लड़का जो बैठा सबसे पीछे ,
करने लगे प्रश्न लोग , अपनी मुट्ठी भींचे ,
आया वो बूढा किसान तब, अरे वो ही दीवान है !
बोला उसने कठिन क्षणों में इंसा की पहचान है ...
जिस मानव ने औरों के दुःख को अपना जाना है ,
उसी वीर हृदय को हमने परिषद् में लाना है ,
चाहे कितने गुण हों किसी में , वृथा हैं सारे मान ,
करे जो न दीन दुखी और मेहनत का सम्मान !
Idgaah- ईदगाह
ईदगाह
ईदगाह( मुशी प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' पर आधारित )
हामिद था एक अच्छा बेटा अपनी माँ का प्यारा ,
बूढी आमना की धुंधली आंखों का तारा ,
गाँव में जब मेला था पाक ईद के मौके पर ,
लगी हुई थी खालिदा , रोटी में चूल्हे चौके पर ,
पोता मेरा खाना खाकर मेले में फिर जायेगा ,
सब बच्चों के जैसे वो भी भर भर खुशियाँ पायेगा ,
होते जो पैसे मुझपे दे देती भर के हाथ ,
लेकिन बस ये तीन पैसे हैं दूँ जो तेरे साथ ,
पैसे वो लेकर के हामिद भागा भर के दम ,
तीन पैसे भी लगे न उसको छह लाखों से कम,
सोचा उसने क्या लूँ में, अपने इतने पैसों में ,
लूँ मिठाई या खेल खिलौने , चुनना है ऐसों में ,
फिर देखा एक कोने में एक बन्दा था कुछ सिमटा ,
बेच रहा था चीख चीख कर वो लोहे का चिमटा...
याद आ गया हामिद को जब रात चूल्हा चलता है ,
बिन चिमटे के हर रोटी पर हाथ माँ का जलता है ,
छ: पैसे का था पर चिमटा सोचा कैसे लूँगा,
बोला भइया तीन का दे दे , ले के माँ को दूँगा ,
बच्चे की जो देखी सूरत बोला चिम्टेवाला ,
ले ले बेटा तीन में तू, जा ईद मनाले आला ,
लौट रहे थे जब घर को सब बच्चे मिल कर बोले ,
अपने सामानों की पुड़िया आओ अब हम खोलें ,
हँसें देख हामिद का चिमटा लेकिन हामिद बोला,
तुमपे तो सब कांच या मिटटी है, टूट पड़े जो डोला ,
मेरे लोहे का चिमटा है , मजबूती का नाम ,
रहे संग ये हरदम मेरे , मदद करे हर काम ,
आई दौडी माँ आँगन तक देखूं हामिद को मेरे ,
क्या खाया मेले में तूने, क्या भाया मन को तेरे ?
खाना खाकर निकला था माँ मैं भूख न थी कुछ मुझको ,
पर मेले से एक चिमटा माँ , लाया हूँ मैं तुझको ,
अबकी जब रोटी सेकेगी, तू चिमटे के साथ ,
होगी मुझको बहुत खुशी की जले न तेरे हाथ ,
माँ के आँसू रुक न सके फिर , पंख लगे थे पाँव में,
आज फ़रिश्ता ईदगाह से आया था ख़ुद गाँव में !
Haar ki jeet - हार की जीत
वतन की मिट्टी से हमने जो विरासत पाई है ,
वही कहानी और सीखें फिर याद किसी को आई हैं ,
कोशिश शुरू हुई है , उस शिक्षा को दोहराने की ,
गाने की , दर्शाने की, जीवन के एक अफ़साने की ,
हार की जीत
( सुदर्शन जी की कहानी 'हार की जीत' पर आधारित )
एक गाँव में रहता था एक पंडित बाबा भारती ,
नेक खुदा का बन्दा था वो सच्चाई उसे सहारती ,
था बस उसका एक प्यार , घोड़ा उसका सुलतान ,
वो ही उसकी ज़िन्दगी था, वो ही उसका मान,
आधी रोटी अपनी हरदम उसको देता था वो,
बैठ पीठ पर उसके खूब मज़े लेता था वो,
ऐसे ही दिन कट जाते , था किस्मत में कुछ और ,
एक दिन गुज़रा खड़क सिंह , डाकू था वो चोर,
पड़ी निगाह तो खुली रह गई देख सुलतान का रंग,
लग असोचने कैसे ले लूँ इसको अपने संग ,
पुछा उसने बाबा से क्या बेचोगे ये तुम,
देखा बाबा ने उसको बोले हो जाओ गुम..
तब चली एक चाल चोर ने बदला अपना भेष ,
बन बैठा एक भिखमंगा वो करके उलझे केश,
जो देखा उसने बाबा को आते अपने घोडे पे,
लगा कराहने करो मदद , रखे हाथ वो जोड़े पे ,
पूछा बाबा ने ए भाई क्या दर्द है तेरे पाँव में ,
कहा पहुंचना है बस जल्दी नजदीकी एक गाँव में ,
दिल था बाबा का कोमल बोले छोडूं आजा ,
बैठा चढ़ कर डाकू उसपर जैसे कोई राजा ,
दो पग भी न चल पाये थे , बाबा को दिया धक्का उसने ,
घोडे की धर डोर स्वयं ही , अपना रुख किया पक्का उसने ,
समझ चुके थे बाबा अब तो डाकू की वह गन्दी घात,
लेकिन कहा उन्होंने हंसके कहना नहीं कभी ये बात,
साथ छूटा नहीं गम मुझे किंतु होगा कष्ठ बड़ा ,
करे कोई न मदद दुखी की, होजो कोई रस्ते में खड़ा ,
जानेंगे जो बन रोगी तुमने लूटा है अब ,
फिर न करेगा मदद कोई भी भय में होंगे सब,
मुंह मोड़ कर अपना चल दिए अपने गाँव ,
एक साँस में पहुंचे घर तक, थके न उनके पाँव,
क्या देखें ? फिर अपने घर में, था उनका सुलतान खड़ा,
डाकू पर भी उन बातों ने कर डाला था असर बड़ा ,
चूम चूम साथी को बोले चल अब खुशियाँ जोडेंगे,
दीन दुखी की मदद से अब लोग मुंह नहीं मोडेंगे !
वही कहानी और सीखें फिर याद किसी को आई हैं ,
कोशिश शुरू हुई है , उस शिक्षा को दोहराने की ,
गाने की , दर्शाने की, जीवन के एक अफ़साने की ,
हार की जीत
( सुदर्शन जी की कहानी 'हार की जीत' पर आधारित )
एक गाँव में रहता था एक पंडित बाबा भारती ,
नेक खुदा का बन्दा था वो सच्चाई उसे सहारती ,
था बस उसका एक प्यार , घोड़ा उसका सुलतान ,
वो ही उसकी ज़िन्दगी था, वो ही उसका मान,
आधी रोटी अपनी हरदम उसको देता था वो,
बैठ पीठ पर उसके खूब मज़े लेता था वो,
ऐसे ही दिन कट जाते , था किस्मत में कुछ और ,
एक दिन गुज़रा खड़क सिंह , डाकू था वो चोर,
पड़ी निगाह तो खुली रह गई देख सुलतान का रंग,
लग असोचने कैसे ले लूँ इसको अपने संग ,
पुछा उसने बाबा से क्या बेचोगे ये तुम,
देखा बाबा ने उसको बोले हो जाओ गुम..
तब चली एक चाल चोर ने बदला अपना भेष ,
बन बैठा एक भिखमंगा वो करके उलझे केश,
जो देखा उसने बाबा को आते अपने घोडे पे,
लगा कराहने करो मदद , रखे हाथ वो जोड़े पे ,
पूछा बाबा ने ए भाई क्या दर्द है तेरे पाँव में ,
कहा पहुंचना है बस जल्दी नजदीकी एक गाँव में ,
दिल था बाबा का कोमल बोले छोडूं आजा ,
बैठा चढ़ कर डाकू उसपर जैसे कोई राजा ,
दो पग भी न चल पाये थे , बाबा को दिया धक्का उसने ,
घोडे की धर डोर स्वयं ही , अपना रुख किया पक्का उसने ,
समझ चुके थे बाबा अब तो डाकू की वह गन्दी घात,
लेकिन कहा उन्होंने हंसके कहना नहीं कभी ये बात,
साथ छूटा नहीं गम मुझे किंतु होगा कष्ठ बड़ा ,
करे कोई न मदद दुखी की, होजो कोई रस्ते में खड़ा ,
जानेंगे जो बन रोगी तुमने लूटा है अब ,
फिर न करेगा मदद कोई भी भय में होंगे सब,
मुंह मोड़ कर अपना चल दिए अपने गाँव ,
एक साँस में पहुंचे घर तक, थके न उनके पाँव,
क्या देखें ? फिर अपने घर में, था उनका सुलतान खड़ा,
डाकू पर भी उन बातों ने कर डाला था असर बड़ा ,
चूम चूम साथी को बोले चल अब खुशियाँ जोडेंगे,
दीन दुखी की मदद से अब लोग मुंह नहीं मोडेंगे !
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