दिल में फिर सिहरन सी? किसका ये साया है ?
वीराने दिल में फिर रहने कोई आया है.....
कहता है दिल तुमको हाथों से छूलूं,
डर है न टूटे जो रिश्ता बनाया है.....
मुझपे तो थी , सारी दुनिया की बंदिश,
दिल मेरा तुमपे किस तरह से आया है?
गर है हकीक़त, ये कैसे मैं मानूं,
जो अपना लगा था, वो आँगन पराया है !
मुहब्बत से हम तो सींचे जा रहे थे,
वो प्यारा सा , नन्हा सा पौधा पराया है,
वो कतरा खुशी का जो पाया अभी था,
वो ज़ज्बा, वो कतरा, चमन ही पराया है,
किसे मानें अपना ? किसे अब पराया ?
जो अपना था छूटा, जो आया पराया है ....
हासिल क्या होगा , तुम्हे यार मेरे?
क्यों तुमने मुझको दीवाना बनाया है?
तुम भी तो झुल्सोगे जो हम जलेंगे,
तौबा खुदा ने क्या शोला लगाया है...
चलो उसको ही सौंपें ये कुदरत की बातें,
कैसा लगा जो ये नगमा सुनाया है?
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Saturday, August 16, 2008
दौर-ऐ-इश्क
गुज़र रही थी ज़िन्दगी अपने ही तौर से ,
नज़र लगी किसी की ,मिले हम इश्क-ऐ-दौर से,
हंसने लगी है दर्पण,कलम भी मुस्कुराई,
ये मैं ही हूँ, या मिल रही हूँ शक्श-और से ?
हर वक्त दिल पर मची हुई परछाईयों की चीख!
कैसे करुँ मैं बंद कान हरसू ये शोर से,
दुनिया तो देखती है मेरे गीत का समाँ,
मिल सका है कौन उन गीतों के छोर से ?
मेरी उम्मीद भी है किसी बच्चे की तरह ,
कोई सुने, न सुने , रोये है ज़ोर से !
रिश्तों का क्या भरोसा? अभी हैं अभी नहीं,
पर दुनिया ही बसी है , इस रिश्तों की डोर से !
नज़र लगी किसी की ,मिले हम इश्क-ऐ-दौर से,
हंसने लगी है दर्पण,कलम भी मुस्कुराई,
ये मैं ही हूँ, या मिल रही हूँ शक्श-और से ?
हर वक्त दिल पर मची हुई परछाईयों की चीख!
कैसे करुँ मैं बंद कान हरसू ये शोर से,
दुनिया तो देखती है मेरे गीत का समाँ,
मिल सका है कौन उन गीतों के छोर से ?
मेरी उम्मीद भी है किसी बच्चे की तरह ,
कोई सुने, न सुने , रोये है ज़ोर से !
रिश्तों का क्या भरोसा? अभी हैं अभी नहीं,
पर दुनिया ही बसी है , इस रिश्तों की डोर से !
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रूह बोलती है !
कलम नहीं अब तो मेरी रूह बोलती है ,
दीवानगी से अपने आशिकी को तोलती है !
नहीं ख़बर थी हमको महंगा था इतना सौदा ,
ये दिलागी सुकून-ऐ-दिल को मोल्ती है ...
दिल करे दुआ, तुझे भी हो मुहब्बत ,
सुनते हैं , गली गली तेरी नज़रें डोलती है ?
चाहत जो तुझको आए ,तो इस कदर सताए ,
सिलवट वो चादरों पे जैसे राज़ खोलती है...
मिल जाए तुखो मंजिल फिर भी दुआ करेंगे,
इस दर्द-ऐ-गम में दिल तेरी हँसी टटोलती है !
दीवानगी से अपने आशिकी को तोलती है !
नहीं ख़बर थी हमको महंगा था इतना सौदा ,
ये दिलागी सुकून-ऐ-दिल को मोल्ती है ...
दिल करे दुआ, तुझे भी हो मुहब्बत ,
सुनते हैं , गली गली तेरी नज़रें डोलती है ?
चाहत जो तुझको आए ,तो इस कदर सताए ,
सिलवट वो चादरों पे जैसे राज़ खोलती है...
मिल जाए तुखो मंजिल फिर भी दुआ करेंगे,
इस दर्द-ऐ-गम में दिल तेरी हँसी टटोलती है !
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Zindagi - ज़िन्दगी
वह रे तेरी धाक ज़िन्दगी !
आईने सी पाक ज़िन्दगी ,
पल में कर दे शहंशाह तो ,
पल में कर दे ख़ाक ज़िन्दगी ...
उनसे मिलना, फिर मिलना , फिर मिलना, मिलते रहना,
नए बहाने मेल जोल के देना तू हर बार ज़िन्दगी ...
सोच सोच कर दिल हँसता है, कैसी ये नादानी है,
फूल पराया है जिसपे आया हमको प्यार ज़िन्दगी !
आईने सी पाक ज़िन्दगी ,
पल में कर दे शहंशाह तो ,
पल में कर दे ख़ाक ज़िन्दगी ...
उनसे मिलना, फिर मिलना , फिर मिलना, मिलते रहना,
नए बहाने मेल जोल के देना तू हर बार ज़िन्दगी ...
सोच सोच कर दिल हँसता है, कैसी ये नादानी है,
फूल पराया है जिसपे आया हमको प्यार ज़िन्दगी !
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Friday, August 15, 2008
mausam-e-ashikana - मौसम-ऐ-आशिकाना
था सौदा बड़ा ही ये सस्ता मगर,
दिल के खोने का गम तो हुआ है हमें,
शायरी जैसी अपनी तो उड़ने लगी,
तेरी चाहत ने जबसे छुआ है हमें,
अब ख्वाहिश है जियें जी भर के इसे,
कल रहे न रहे मौसम-ऐ-आशिकाना ,
ये खुदा की है रहमत, तुम जो भी कहो ,
हर किसी को मिले न खुशी का खजाना .....
दिल के खोने का गम तो हुआ है हमें,
शायरी जैसी अपनी तो उड़ने लगी,
तेरी चाहत ने जबसे छुआ है हमें,
अब ख्वाहिश है जियें जी भर के इसे,
कल रहे न रहे मौसम-ऐ-आशिकाना ,
ये खुदा की है रहमत, तुम जो भी कहो ,
हर किसी को मिले न खुशी का खजाना .....
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dhadkan - धड़कन
ये कहती है दुनिया , क़दम न बढ़ा ,
नशा ये मुहब्बत का है सर चढा ,
जो चढ़ जाए आए क़यामत की सूरत,
लगे ये जहाँ हर झलक खूबसूरत ,
पर टूटेगा जब तेरे दिल का गुमाँ ये,
तो बन जाएगा हर समाँ बद्नूमां ये,
जो रो ओगे तुम तो ये दुनिया हँसेगी ,
तेरे आंसूओं पे ये ताने कसेगी,
पता है सिला मुझको उल्फत का तब भी !
धड़कता है दिल तुमको देखूं मैं जब भी !
नशा ये मुहब्बत का है सर चढा ,
जो चढ़ जाए आए क़यामत की सूरत,
लगे ये जहाँ हर झलक खूबसूरत ,
पर टूटेगा जब तेरे दिल का गुमाँ ये,
तो बन जाएगा हर समाँ बद्नूमां ये,
जो रो ओगे तुम तो ये दुनिया हँसेगी ,
तेरे आंसूओं पे ये ताने कसेगी,
पता है सिला मुझको उल्फत का तब भी !
धड़कता है दिल तुमको देखूं मैं जब भी !
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Phursat - फुर्सत
फुर्सत मिल जाए तुम्हें जो कहीं ,
पूछना इतना नाज़ करती वो क्यों है?
जो वक्त-ऐ-शिकायत का ले वो बहाना ,
उससे कहना दिल में अरमाँ वो भरती ही क्यों है?
फुर्सत ही ने मुझसे कभी ये कहा था,
की भूले से दिल ये लगाना नहीं ,
मिलेगी न फुर्सत जो दिल को लगाया ,
मैं मुहब्बत में थी मैंने माना नहीं...
अब मिला जो सिला दिल लगाने का मुझको ,
मैं रो रो के ढूढूं वो फुर्सत के पल,
हर वक्त एक साया , है नज़रों पे छाया ,
मशरूफ है दिल मेरा आजकल !
पूछना इतना नाज़ करती वो क्यों है?
जो वक्त-ऐ-शिकायत का ले वो बहाना ,
उससे कहना दिल में अरमाँ वो भरती ही क्यों है?
फुर्सत ही ने मुझसे कभी ये कहा था,
की भूले से दिल ये लगाना नहीं ,
मिलेगी न फुर्सत जो दिल को लगाया ,
मैं मुहब्बत में थी मैंने माना नहीं...
अब मिला जो सिला दिल लगाने का मुझको ,
मैं रो रो के ढूढूं वो फुर्सत के पल,
हर वक्त एक साया , है नज़रों पे छाया ,
मशरूफ है दिल मेरा आजकल !
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