Saturday, August 15, 2009
आजादी
http://www.youtube.com/watch?v=tsCVGHCQ0lI
देखो ये बस्ती ये हँसते चेहरे,
न कोई बंदिश न कोई पहरे,
हो मुबारक हिन्दोस्तान को आजादी का सिला,
जब जवानों ने जान गवांई , हंस के गोली सीने पे खायी ,
उनकी कुर्बानी के ही दम से हम को ये दिन मिला,
वादा करो की सब ऊंचा रखोगे अब भारत का झंडा,
देखो शान हिमालय का पड़ जाए न ठंडा,
अब हमको लड़ना है अब के हालातों से रखना है भारत का नाम ,
शक्ति से भक्ति से मुक्ति हो पापों की , आओ करें हम वो काम,
आए यहाँ हो तो डॉलर के पीछे ही भागो न तुम सुबह-ओ-शाम,
बातों सखी को तुम खुशियों के मोटी, रखना हँसी के पयाम ,
रोती है दुनिया हँसाके दिखाओ , बच्चों को संस्कारें सिखाओ,
सारी ही दुनिया को अपना समझ कर करना सबका भला,
अपने घर को मन्दिर बनाओ, मदिरा सिगरेट इसमे न लाओ,
जैसे चलोगे तुम अपनी चालें, बच्चा वैसा चला,
बच्चों को हर दिन पार्क लेके जाना उनका बचपन खिलेगा ,
बीवी को वीकेंड में बहार खिलाना , प्यार दुगुना मिलेगा,
दिया खुदा ने तुम्हे है ये किस्मत, आके यहाँ हो बसे,
खोना न मिट्टीसे रिश्ता वो अपना, पश्चिम तुम्हें न दसे ,
अपने खजाने से छोटी अट्ठानी गर दे दो तुम दान में,
मिल जाए तो कोई बच्चे को अवसर, बढ़ जाए वो ज्ञान में,
माँ के कर्जे को कुछ तो चुकाओ,
पुण्य कमाओ , टैक्स भी बचाओ,
इतनी दूरी पे बैठे हैं हम सब , कर पायें और क्या?
आज़ादी का तिरंगा सजाओ, सभ्यता के नगाडे बजाओ,
आज मिलकर इस अनगन में बनाएं भारत नया,
हो मुबारक सबको आज, आजादी का जलसा,
देश महका रहे मेरा हरदम एक कमल सा.........
Thursday, April 2, 2009
हम गुस्से में चिल्लाते क्यूँ हैं ?
आज एक बहुत ही अच्छी कहानी पढ़ी मैंने | इसे पढ़कर मुझे कविता लिखने का मन किया सो मैंने एक कविता लिखी है | मूल विचार मेरे नहीं हैं किन्तु इसे कविता के रूप में ढालने का प्रयास किया है| कहानी को भी कविता के बाद संलग्न किया है ताकि आप उसका भी आनंद ले सकें |
तो लीजिये आप के लिए -
हम गुस्से में चिल्लाते क्यूँ हैं ?
सोचा है क्या तुमने हम गुस्से में आपा खोते क्यूँ हैं,
जो चाहें मीठे फल पाना तो हम कांटे बोते क्यूँ हैं ?
अपने गुस्से को चीखों से, शोरों से, बतलाते क्यूँ हैं ,
पास खडा हो व्यक्ति फिर भी हम उस पर चिल्लाते क्यूँ हैं ?
जब दिल से दिल की दूरी इतनी ज्यादा बढ़ जाती है,
तब आवाजों के पावों में जैसे बेडी पड़ जाती है ,
बिन चीखे, जो सामने तक, नहीं पहुँचता सार है ,
लेता जनम चीत्कार तब जब टूट जाता प्यार है |
वहीँ, जहाँ दो दिल मिले बैठें, शोरों की दरकार कहाँ है ?
मौन बात हो, समझ साथ हो, तो चीखें चीत्कार कहाँ है ?
होती बात निगाहों में ही, हों आखें जो चार तो क्या है ?
और बात होठों से निकले बिन जो हो स्वीकार तो क्या है ?
रखना इसे तुम ध्यान में की दिल की दूरी दूर हो,
ना दोस्ती फिर टूटने को, फिर कोई, मजबूर हो.....
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Original Story-
A saint asked his disciples, 'Why do we shout in anger? Why do people shout at each other when they are upset?'
Disciples thought for a while, one of them said, 'Because we lose our calm, we shout for that.'
'But, why to shout when the other person is just next to you?' asked the saint.
'Isn't it possible to speak to him or her with a soft voice? Why do you shout at a person when you're angry?'
Disciples gave some other answers but none satisfied the saint.
Finally he explained, 'When two people are angry at each other, their hearts distance a lot. To cover that distance they must shout . More the angry, more the distance between hearts & louder you should shout to cover the distance & reach him.
Then the saint asked, 'What happens when two people fall in love? They don't shout at each other but talk softly, why? Because their hearts are very close. The distance between them is very small....' They do not speak, only whisper and they get even closer to each other in their love. Finally they even need not whisper, they only look at each other and that's all. That is how close two people are when they love each other.'
MORAL: When you argue, do not let the hearts go far away & do not say words that keeps the distance of each other more, else there will come a day when the distance is so great that you will not find the path to return.
Tuesday, March 17, 2009
नौकरी की टोकरी पार्ट 2
पर काल चला चाल, देख मेरी वो हंसी,
मैं नौकरी की टोकरी के जाल मैं फँसी |
हाँ, थी मेरी तमन्ना , मेरा भी व्हाइट कोल्लर होगा,
होगी मेरी एक पहचान और जेब में डॉलर होगा ,
पर डॉलर आया बाद में, पहले जीवन ही कट गया ,
मेर बच्चों का बचपन , मेरे कैलंडर से हट गया !
एक एक कर कटते गए, वो लाड प्यार वो हंसी खेल,
अब तो हेलो कहने को भी , पतिदेव करते हैं मेल,
मैं दिन भर करती काम, रात भर उनकी मीटिंग चलती है,
जो खाना टाइम से नहीं बना, तो बोलो किसकी गलती है ?
मुझे यही गिला था, की जॉब बड़ी मुश्किल से मिला था,
(मैंने इनसे कहा )-
जो ज़रा सहारा दे दोगे तो क्यातुम्हारा जायेगा,
आखिर डॉलर अपने घर ही तो आएगा...
तिस पर ये बोले - जान , माना तुम मेरी लाइफ हो,
पर क्या पूरे संसार मैं तुम अकेली वर्किंग वायिफ हो?
ये जो काम खाना बनाना है, बिलकुल ही जनाना है,
कोई मर्दों का काम हो तो कहो, वर्ना खाना बनाओ और खुश रहो,
देखो जेन्नी को, सिंगल ही दो बच्चे पालती है
कितनी बखूबी जॉब, फॅमिली और फिगर भी संभालती है !
देसी लड़की माँ बनते ही जाने क्यों ढल जाती है,
माँ के साथ औरत का जज्बा नहीं संभाल वो पाती है,
मैं क्यूँ देखूं जेन्नी को, मुझको लज्जा आती है,
जाने क्यूँ देसी पतियों को गोरी मेम ही भाति है ,
छोडो- छोडो , रोज़ के झगडे , इनसे क्या तुम पाओगे?
कल पेरेंट - टीचर कोफेरेंस है, बच्चों के स्कूल जाओगे?
नहीं नहीं, कल तो मेरी मीटिंग है---
अरे , ये सरासर चीटिंग है ....
सब कामों में कुछ ही तो मर्दों के काम कहलाते हैं,
अब वो भी मेरे सर मंड के, खूब मुझे बहलाते हैं,
अपने मेनेजर और बच्चों के टीचर को तुम ही जता पाओगी,
तुम माँ हो, बच्चों के प्रोब्लेम्स तुम बेहतर बता पाओगी..
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अगले दिन ऑफिस में बहुत काम था, टेप आउट का आखरी मकाम था,
सूली पर मेरा सर था, उस पर ले ऑफ का डर था ,
फिर भी गयी स्कूल बचों की रिपोर्ट कार्ड को लाने ,
कौन कहाँ से क्या बोलेगा, क्या होगा , क्या जाने ?
सब टीचर की यह हिदायत , एक वही सरसरी बात,
प्लीज़ बिताएं अधिक वक़्त अपने बच्चों के साथ,
जीवन की भागादौडी में, टाइम ही तो मिस है,
मुझे माफ़ करदो बच्चों, शायद तुम्हारी माँ सेल्फिश है,
मैं धरती से बंधी बंधी , आसमां नहीं हूँ,
और भी रूप हैं मेरे, सिर्फ माँ नहीं हूँ,
करती हूँ पूरी कोशिश, तुम्हें कमी ना आए,
रहे ख़ुशी दिल में , आँखों में नमी न आये,
पर भूलूँ मैं खुद को, ऐसा हार्ट नहीं है,
और सब कुछ कर दूं, इतन भी मम्मी स्मार्ट नहीं है,
लेकिन बच्चों कसो कमर, हमको मंजिल पानी है,
होगी उसकी जीत की जिसकी हिम्मत हिन्दुस्तानी है ,
आओ मिलके करें कुछ ऐसा, भारत को हमपे गर्व हो,
हर रात दिवाली हो अपनी, हर दिन होली का पर्व हो ......
आओ इसकी विडियो यहाँ देख सकते हैं -
http://www.youtube.com/watch?v=tgp13h9P2HI&feature=channel_पेज
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Wednesday, November 5, 2008
मैं और अमरीका !
अमरीका में मैं दस साल से रह रही हूँ | अब ये भी घर सा लगने लगा है | ऐसा नहीं है की भारत को मैं भूली हूँ | आज भी भारत तन मन में बसता है लेकिन जिस देश से मुझे रोटी मिलती है , मेरे बच्चों को शिक्षा मिलती है , जहाँ मेरा परिवार बसता है, और जहाँ आज मैं गर्व से अपने देश और अपनी संस्कृति को represent करती हूँ, उस देश और उस धरती के प्रति भी मेरा कुछ कर्तव्य है | ये रिश्ता मुझे ज़ोर दे रहा है की मैं इसकी अस्मिता और आन के लिए , हमारे और इसके बीच प्यार और विश्वास को बनाए रखने के लिए आवाज़ दूँ | आशा है आप इसे सच्ची भावना से स्वीकार करेंगे-
जिसका खाया नमक, समय है, आज अदा वो हक करें,
अपनी जुबां और ईमां पर , ये जहाँ कभी न शक करे ,
सीखा है मैंने तो बस, वसुधैव कुटुंब को अपनाना,
तभी तो मैंने इस धरती को भी है अपना जाना,
मैं रहती जिस देश में भइया, उसपर सब कुछ वारूँगी,
वो न समझें चाहे अपना, मैं हिम्मत नहीं हारूंगी !
सोच समझ कर दूँगी मत मैं, मेरा चुना जो पायेगा,
रहे मेरा परिवार खुशी से, रामराज तब आएगा ,
भारत से मेरा नाता है , अमरीका भी प्यारा है,
दोनों देशों से ही अब तो जुड़ गया भाग्य हमारा है,
दोनों को ही घर मैं मानूं , आपका क्या ख्याल है ?
भारत है जो मायका मेरा, अमरीका ससुराल है !
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Sunday, August 31, 2008
मेरी सहेली
http://www.youtube.com/watch?v=mY9hYl_0i8Y
ज़िन्दगी भर उस से मेरी होड़ सी लगी रही,
वो पहेली, मेरी सहेली , निज रक्त सी सगी रही ,
बात करके आज उस से , मन लगा उड़ने वहां पर ,
घर द्वार , इस संसार से, हट के बसे दुनिया जहाँ पर ,
जल उठी मेरी मन की नारी , उस चंचला को देख कर ,
स्वयं को उस आकांक्षी से नापते लगता है डर ,
चले तो एक साथ थे , हम दोनों एक चाह में,
उच्च शिखरों के स्वप्न में , अभिलाषा के राह में ,
मेरी सखी, जिसने रखी, जो भी कहा सब कर गई ,
मैं तो जैसे , इतनी जल्दी, इस जीवन से डर गई ,
पच्चीस में ही पचास का एहसास जब होने लगे ,
उमंगें जब कर्तव्य के काँधें पे ही सोने लगे ,
जब स्वप्न से आकर भिडें धरातल की वो सच्चाइयाँ,
तोड़ दे तरंगों को जो संसार की परछाईयाँ,
तो विद्रोह कर उठ ता है मन की क्यों चडी उस डाल पर,
जहाँ पहुँच कर बस नहीं है , स्वयं अपना काल पर ,
जब नचाता है समय इंसान को निज ताल पर ,
देख हंस देता है मानव स्वयं अपने हाल पर ,
कहने लगी मेरी सखी क्या थी तू क्या हो गई ,
क्या तेरे सपनों की वो सारी कलियाँ खो गई ?
बादल, झरने, बरखा, पानी ,
तितली , छतरी , आसमानी ,
क्या तेरे जग जीतने की वो अभिलाषा खो गई ?
तू तो एक छोटे से घर की हो गई ,
उत्तर दिया मुड कर उसे मेरे विवेक ने गर्व से ,
हैं कम नहीं मेरे ये दिन त्यौहार या किसी पर्व से ,
जीता जगत तो क्या जीता , बन गए राजा तो क्या जानें ?
कर सको जीवन रचना , फूँक सको प्राण तो हम मानें !
पाया जो नारी का ये तन वात्सल्य प्रथम कर्तव्य है ,
आज ममता के ही दम से विश्व जनता सभ्य है ,
कर सकें हम गर किसी एक हृदय का शुद्ध विकास ,
तभी रास्ट्र निर्माण बन पायेगा सक्षम अविनाश ,
मत मान लो, घर द्वार मेरे स्वप्न का परित्याग है ,
मेरी आकांक्षा तो बड्नावल की वो आग है ,
कर्तव्य की प्राथमिकता अनुसार नारी ढलती है यहाँ ,
पर आकांक्षाएं तो संग संग चलती है यहाँ ,
पंचम में बृहस्पति अब मेरा गुरु हुआ है ,
अरे देखो ना , जीवन तो अभी शुरू हुआ है !
जो कहा था मैंने ना कर दूँ, अब वही तीर तो साधा है,
सब होगा सिद्ध अब जीवन में, ये मेरा तुमसे वादा है !
सुन मेरे ये वचन मेरी सखी अब मौन है ,
बंधुओं अब ये तो बूझो, वो सखी आख़िर कौन है ?
इस बात को कैसे कहूँ, इसी बात का तो दुःख है ,
वो कोई और नहीं मेरी तस्वीर का ही रुख है ,
रुख वह जो अब तक बचपन के उन ख़्वाबों में बंद है ,
जो उन्मुक्त है , आजाद है , स्वतंत्र है, स्वछन्द है ,
एक रुख ये है जो रखे है पहले जिम्मेदारियों को ,
प्रणाम करते हैं अंत में सब माँओं को सब नारियों को |
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