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Tuesday, August 25, 2009

पास पड़ोस

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आज सुनाऊं तुम्हें कथा जिसमे राजा रानी है,
परी नहीं , ना हाथी घोडे ऐसी अजब कहानी है,

अमरीका के किसी शहर में पांच पडोसी रहते थे,
साथ मनाते खुशियाँ वो सब मिल के दुःख सुख सहते थे,
हर होली पर रंग, दिवाली रौनक का आभास था,
इसी मुहल्ले में उन सब का घर बहुत ही पास था,

हर बात बहुत ही आम होती, हर पार्टी सुबह से शाम होती,

फिर शाम से होती रात..... कितनी लम्बी होती बात,

बच्चों का अलग ही जोश होता , किसे अपने पराये का होश होता,
हर कोई लगता अपना था , सच था या कोई सपना था ,

बिन पूछे , बिन फ़ोन किये, जिनके घर हम जा पायें,
वक़्त पड़े तो दूध-टमाटर-दही उधारी ला पायें ,
हर आफत में देता है जो बढ़के अपना कन्धा,
किस्मत वाले पायें ऐसा पास पड़ोस का बंदा,

फिर जैसे खुदा का उदास मन हुआ,
और अमरीका में डिप्रेसन हुआ...

इस आंधी के आगे किसी का बूता नहीं था ,
अफरा तफरी से मेरा मुहल्ला भी अछूता नहीं था ,

कोई नए घर , नए स्कूल गए...... फिर शायद हमको भूल गए ....

जो किसी का देश प्रेम जागा, तो वह सपरिवार अपनी माटी की और भागा,

एक एक कर सब अलविदा कह गए ,
अब पांच में से बस हम दो रह गए....

सो उनका भी कल यहाँ से ट्रान्सफर हो गया,
और हमारा हँसता खेलता पड़ोस जैसे सो गया...

अब पहचाने से चेहरे हैं , पैर जाने ये सब कौन हैं?
कहते हेलो हेलो हैं, पर दिल से सारे मौन हैं |

सामने का आँगन जिसपर गुडिया खेला करती थी,
पूछेगी "मैं जाऊं ?" पर मम्मी से डरती थी,
मेरे बच्चे, उनके घर , बिन बोले भागे जाते थे,
आधे दिन तो वो भोजन उनके ही घर खाते थे,

बिन तुम सब के, सचमुच, सबकुछ, कितना फीका फीका है,
लोग कहें परदेस जिसे , क्या ये ही वो अमरीका है?

भारत हो या अमरीका, हमने तो बस ये सीखा ,
चाहे कितने गुण या दोष रहे,
अपने लगे, जहाँ अपना पास पड़ोस रहे......

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Saturday, August 15, 2009

आजादी

आप इस कविता की विडियो यहाँ देख सकते हैं -
http://www.youtube.com/watch?v=tsCVGHCQ0lI

देखो
ये बस्ती ये हँसते चेहरे,
कोई बंदिश कोई पहरे,
हो मुबारक हिन्दोस्तान को आजादी का सिला,
जब जवानों ने जान गवांई , हंस के गोली सीने पे खायी ,
उनकी कुर्बानी के ही दम से हम को ये दिन मिला,
वादा करो की सब ऊंचा रखोगे अब भारत का झंडा,
देखो शान हिमालय का पड़ जाए ठंडा,

अब हमको लड़ना है अब के हालातों से रखना है भारत का नाम ,
शक्ति से भक्ति से मुक्ति हो पापों की , आओ करें हम वो काम,
आए यहाँ हो तो डॉलर के पीछे ही भागो तुम सुबह--शाम,
बातों सखी को तुम खुशियों के मोटी, रखना हँसी के पयाम ,
रोती है दुनिया हँसाके दिखाओ , बच्चों को संस्कारें सिखाओ,
सारी ही दुनिया को अपना समझ कर करना सबका भला,
अपने घर को मन्दिर बनाओ, मदिरा सिगरेट इसमे लाओ,
जैसे चलोगे तुम अपनी चालें, बच्चा वैसा चला,
बच्चों को हर दिन पार्क लेके जाना उनका बचपन खिलेगा ,
बीवी को वीकेंड में बहार खिलाना , प्यार दुगुना मिलेगा,



दिया खुदा ने तुम्हे है ये किस्मत, आके यहाँ हो बसे,
खोना मिट्टीसे रिश्ता वो अपना, पश्चिम तुम्हें दसे ,
अपने खजाने से छोटी अट्ठानी गर दे दो तुम दान में,
मिल जाए तो कोई बच्चे को अवसर, बढ़ जाए वो ज्ञान में,

माँ के कर्जे को कुछ तो चुकाओ,
पुण्य कमाओ , टैक्स भी बचाओ,
इतनी दूरी पे बैठे हैं हम सब , कर पायें और क्या?
आज़ादी का तिरंगा सजाओ, सभ्यता के नगाडे बजाओ,
आज मिलकर इस अनगन में बनाएं भारत नया,

हो मुबारक सबको आज, आजादी का जलसा,
देश महका रहे मेरा हरदम एक कमल सा.........

Wednesday, June 17, 2009

बात जो दिल में थी आज फिर..दिल ही में रह गयी....

कहना था कुछ , क्या कहना था, जाने क्या कह गयी,
बात जो दिल में थी आज फिर, दिल ही में रह गयी ,

क्यूँ रुक रुक के लिखती हूँ मैं, क्यूँ हकलाऊं इतना,
वो पर्वत सी हिम्मत मेरी रेत सी क्यूँ ढह गयी ?

किस साहिल से टकराऊंगी, छोड़ किनारा अपना,
डरती हूँ जो इस ज्वार में आज अगर बह गयी ...

जैसा था फिर वैसा होगा, भरम ये कैसे पालूँ,
रिश्ते नाते पड़ जाएँ झूठे, जो मैं सच कह गयी,

कितना मुशकिल है अनदेखा कर पाना काँटों को,
जब काँटों में गुल मुस्काया फिर मैं सब सह गयी .....

Thursday, April 2, 2009

हम गुस्से में चिल्लाते क्यूँ हैं ?

नमस्कार मित्रों,

आज एक बहुत ही अच्छी कहानी पढ़ी मैंने | इसे पढ़कर मुझे कविता लिखने का मन किया सो मैंने एक कविता लिखी है | मूल विचार मेरे नहीं हैं किन्तु इसे कविता के रूप में ढालने का प्रयास किया है| कहानी को भी कविता के बाद संलग्न किया है ताकि आप उसका भी आनंद ले सकें |

तो लीजिये आप के लिए -

हम गुस्से में चिल्लाते क्यूँ हैं ?

सोचा है क्या तुमने हम गुस्से में आपा खोते क्यूँ हैं,
जो चाहें मीठे फल पाना तो हम कांटे बोते क्यूँ हैं ?
अपने गुस्से को चीखों से, शोरों से, बतलाते क्यूँ हैं ,
पास खडा हो व्यक्ति फिर भी हम उस पर चिल्लाते क्यूँ हैं ?

जब दिल से दिल की दूरी इतनी ज्यादा बढ़ जाती है,
तब आवाजों के पावों में जैसे बेडी पड़ जाती है ,
बिन चीखे, जो सामने तक, नहीं पहुँचता सार है ,
लेता जनम चीत्कार तब जब टूट जाता प्यार है |

वहीँ, जहाँ दो दिल मिले बैठें, शोरों की दरकार कहाँ है ?
मौन बात हो, समझ साथ हो, तो चीखें चीत्कार कहाँ है ?
होती बात निगाहों में ही, हों आखें जो चार तो क्या है ?
और बात होठों से निकले बिन जो हो स्वीकार तो क्या है ?

रखना इसे तुम ध्यान में की दिल की दूरी दूर हो,
ना दोस्ती फिर टूटने को, फिर कोई, मजबूर हो.....


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Original Story-

A saint asked his disciples, 'Why do we shout in anger? Why do people shout at each other when they are upset?'
Disciples thought for a while, one of them said, 'Because we lose our calm, we shout for that.'

'But, why to shout when the other person is just next to you?' asked the saint.
'Isn't it possible to speak to him or her with a soft voice? Why do you shout at a person when you're angry?'

Disciples gave some other answers but none satisfied the saint.

Finally he explained, 'When two people are angry at each other, their hearts distance a lot. To cover that distance they must shout . More the angry, more the distance between hearts & louder you should shout to cover the distance & reach him.

Then the saint asked, 'What happens when two people fall in love? They don't shout at each other but talk softly, why? Because their hearts are very close. The distance between them is very small....' They do not speak, only whisper and they get even closer to each other in their love. Finally they even need not whisper, they only look at each other and that's all. That is how close two people are when they love each other.'

MORAL: When you argue, do not let the hearts go far away & do not say words that keeps the distance of each other more, else there will come a day when the distance is so great that you will not find the path to return.

Tuesday, March 17, 2009

नौकरी की टोकरी पार्ट 2

जब मैं एक हाउस वायिफ थी, क्या कूल मेरी लाइफ थी !

पर काल चला चाल, देख मेरी वो हंसी,
मैं नौकरी की टोकरी के जाल मैं फँसी |

हाँ, थी मेरी तमन्ना , मेरा भी व्हाइट कोल्लर होगा,
होगी मेरी एक पहचान और जेब में डॉलर होगा ,

पर डॉलर आया बाद में, पहले जीवन ही कट गया ,
मेर बच्चों का बचपन , मेरे कैलंडर से हट गया !

एक एक कर कटते गए, वो लाड प्यार वो हंसी खेल,
अब तो हेलो कहने को भी , पतिदेव करते हैं मेल,

मैं दिन भर करती काम, रात भर उनकी मीटिंग चलती है,
जो खाना टाइम से नहीं बना, तो बोलो किसकी गलती है ?

मुझे यही गिला था, की जॉब बड़ी मुश्किल से मिला था,

(मैंने इनसे कहा )-
जो ज़रा सहारा दे दोगे तो क्यातुम्हारा जायेगा,
आखिर डॉलर अपने घर ही तो आएगा...

तिस पर ये बोले - जान , माना तुम मेरी लाइफ हो,
पर क्या पूरे संसार मैं तुम अकेली वर्किंग वायिफ हो?

ये जो काम खाना बनाना है, बिलकुल ही जनाना है,
कोई मर्दों का काम हो तो कहो, वर्ना खाना बनाओ और खुश रहो,

देखो जेन्नी को, सिंगल ही दो बच्चे पालती है
कितनी बखूबी जॉब, फॅमिली और फिगर भी संभालती है !

देसी लड़की माँ बनते ही जाने क्यों ढल जाती है,
माँ के साथ औरत का जज्बा नहीं संभाल वो पाती है,

मैं क्यूँ देखूं जेन्नी को, मुझको लज्जा आती है,
जाने क्यूँ देसी पतियों को गोरी मेम ही भाति है ,

छोडो- छोडो , रोज़ के झगडे , इनसे क्या तुम पाओगे?
कल पेरेंट - टीचर कोफेरेंस है, बच्चों के स्कूल जाओगे?

नहीं नहीं, कल तो मेरी मीटिंग है---
अरे , ये सरासर चीटिंग है ....

सब कामों में कुछ ही तो मर्दों के काम कहलाते हैं,
अब वो भी मेरे सर मंड के, खूब मुझे बहलाते हैं,

अपने मेनेजर और बच्चों के टीचर को तुम ही जता पाओगी,
तुम माँ हो, बच्चों के प्रोब्लेम्स तुम बेहतर बता पाओगी..

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अगले दिन ऑफिस में बहुत काम था, टेप आउट का आखरी मकाम था,
सूली पर मेरा सर था, उस पर ले ऑफ का डर था ,

फिर भी गयी स्कूल बचों की रिपोर्ट कार्ड को लाने ,
कौन कहाँ से क्या बोलेगा, क्या होगा , क्या जाने ?

सब टीचर की यह हिदायत , एक वही सरसरी बात,
प्लीज़ बिताएं अधिक वक़्त अपने बच्चों के साथ,

जीवन की भागादौडी में, टाइम ही तो मिस है,
मुझे माफ़ करदो बच्चों, शायद तुम्हारी माँ सेल्फिश है,

मैं धरती से बंधी बंधी , आसमां नहीं हूँ,
और भी रूप हैं मेरे, सिर्फ माँ नहीं हूँ,

करती हूँ पूरी कोशिश, तुम्हें कमी ना आए,
रहे ख़ुशी दिल में , आँखों में नमी न आये,

पर भूलूँ मैं खुद को, ऐसा हार्ट नहीं है,
और सब कुछ कर दूं, इतन भी मम्मी स्मार्ट नहीं है,

लेकिन बच्चों कसो कमर, हमको मंजिल पानी है,
होगी उसकी जीत की जिसकी हिम्मत हिन्दुस्तानी है ,

आओ मिलके करें कुछ ऐसा, भारत को हमपे गर्व हो,
हर रात दिवाली हो अपनी, हर दिन होली का पर्व हो ......

आओ इसकी विडियो यहाँ देख सकते हैं -
http://www.youtube.com/watch?v=tgp13h9P2HI&feature=channel_पेज

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Wednesday, November 5, 2008

मैं और अमरीका !

अमरीका में मैं दस साल से रह रही हूँ | अब ये भी घर सा लगने लगा है | ऐसा नहीं है की भारत को मैं भूली हूँ | आज भी भारत तन मन में बसता है लेकिन जिस देश से मुझे रोटी मिलती है , मेरे बच्चों को शिक्षा मिलती है , जहाँ मेरा परिवार बसता है, और जहाँ आज मैं गर्व से अपने देश और अपनी संस्कृति को represent करती हूँ, उस देश और उस धरती के प्रति भी मेरा कुछ कर्तव्य है | ये रिश्ता मुझे ज़ोर दे रहा है की मैं इसकी अस्मिता और आन के लिए , हमारे और इसके बीच प्यार और विश्वास को बनाए रखने के लिए आवाज़ दूँ | आशा है आप इसे सच्ची भावना से स्वीकार करेंगे-


जिसका खाया नमक, समय है, आज अदा वो हक करें,
अपनी जुबां और ईमां पर , ये जहाँ कभी न शक करे ,

सीखा है मैंने तो बस, वसुधैव कुटुंब को अपनाना,
तभी तो मैंने इस धरती को भी है अपना जाना,

मैं रहती जिस देश में भइया, उसपर सब कुछ वारूँगी,
वो न समझें चाहे अपना, मैं हिम्मत नहीं हारूंगी !

सोच समझ कर दूँगी मत मैं, मेरा चुना जो पायेगा,
रहे मेरा परिवार खुशी से, रामराज तब आएगा ,

भारत से मेरा नाता है , अमरीका भी प्यारा है,
दोनों देशों से ही अब तो जुड़ गया भाग्य हमारा है,

दोनों को ही घर मैं मानूं , आपका क्या ख्याल है ?
भारत है जो मायका मेरा, अमरीका ससुराल है !

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Monday, October 13, 2008

मेट्रीमोनी

एक दिन अकस्मात् , हो गई दासजी से मुलाकात,
हमने कहा कैसे हैं सर,
उन्होंने कहा क्या सुनाएँ ख़बर ?
तीस साल से हैं अमरीका ,
रहन सहन इस देश का सीखा,
कटी जवानी डॉलर पीछे ,
काम किया बस आँखें मींचे ,
दया प्रभु की सब है चंगा ,
बस जीवन में अब एक पंगा,

बड़ी कार , बड़ा बैंक बैलेंस , बड़ी सोसाइटी में घर है,
चाहिए तो बस बेटे को एक बहू और बेटी को एक वर है ,

हमने कहा - अजी ! टेक्नोलोजी का लाभ उठाइए ,
शादी डॉट कॉम पर जाइये ,
उन्होंने हमें घूरा , फिर कहा ,
हमने बहुत है खर्च किया ,
सारे साइटों पर सर्च किया ,
पर अपने तो भाग ही फूटे हैं ,
वहां तो आधे नाम ही झूठे हैं !
हाँ , एक आध सच्चे भी हैं,
हम से सीरियस , अच्छे भी हैं |

हमने बात करी, फोटो आए ,
हमने घर सबको दिखलाये,
बेटी यहीं जो पली बढ़ी ,
हर फोटो पे उसकी नाक चढी ,

हुई खुशी मैं सीना तान गया ,
चलो बेटा किसीपे मान गया ,
पर देखा जो मैंने फोटो दिल ऐसा मेरा धड़का था,
की मेरी फ्यूचर बहू रानी एक लड़की नहीं एक लड़का था ,

कोई बताये हमको ये आज,
ये कब बदला अपना समाज ,
य एरंग नया, वो संग नया,
अब जीने एक तो ढंग नया...

चलो बेटी की बताते हैं..

एक मित्र के सुपुत्र का बेटी को रिश्ता आया था,
फिर जुड़ जायेंगे भारत से ये सोचक के मन हर्षाया था,
फ्यूचर समधन से बोले हम ,
अब मिट जायेंगे सारे गम,
मेरी बेटी को अब तो अपनों का लाड मिलेगा,
वो पूछीं मेरे बेटे को कब तक ग्रीन कार्ड मिलेगा ?

मिस्टर दस थे बड़े उदास ,
टेंशन में सुबहो शाम थे,
निज देश त्याग , परदेस में
रहने के ये कुछ इनाम थे,

मिस्टर दास का सुनकर हाल कलेजा मेरा हिल गया ,
जो पहुँची मैं दफ्तर , एक मित्र भारतीय मिल गया ,
नाम तो उसका शान था,
हरदम रहता परेशान था,

जो मैंने सुनाई उसको दासजी की कथा ,
लगा सुनाने वो भी अपनी शादी की दारुण व्यथा !

उनका क्या सुनती हो ? हमारा सुनो ..

तुम सुनो तो मेरा हाल,पिछले तीन साल ..

एक बस एक भारतीय कन्या के लिए
बीन बजा रहा हूँ, सपने सजा रहा हूँ,
राग मल्हार गा रहा हूँ,
और रोटी के अभाव में पिजा खा रहा हूँ !

पर ये इंडियन लड़कियां इतनी कसाई हैं ,
की इनके लिए हम तो बकरे के भाई हैं ,

जितने हमारे सर पर बाल हैं,
उससे भी ज़्यादा उनके सवाल हैं ,

एक ने पूछा क्या है वीसा ,एक ने पूछा क्या है pay ?
सान फ्रांसिस्को में रहते हो, I hope you are not a gay !
एक ने पूछा स्टॉक हैं ? या रियल इस्टेट में डाला है?
या अब तक अपने तनखे से बस ख़ुद ही को पाला है?
क्या क्या कहूँ सवाल थे सारे , भाग गया मैं डर के मारे..

जो पूछेंगी ये लड़कियां इतने सवाल तकनीकी,
तो देखूँगा लड़की मैं - रुसी, चीनी , अमरीकी...
जाने इंडियन गर्ल्स को क्या हो गया है ?
इनकी शरम, इनका धरम कहाँ खो गया है?

हमारा मित्र भारतीय नारी के अभिमान को रो रहा था ,
हमें गर्व हो रहा था, बहुत गर्व हो रहा था !

फिर भी हिम्मत देने को हमने बोला,
लड़की educated है बम का गोला ..

कम पढ़ी लिखी भोली भाली कहो तो ढूंढ के लाऊँ ,
जो कहे पति को परमेश्वर , मैं तुमको दिखलाऊँ,

वो चीखा - नह्ह्ह्ह्हीं !
बीवी की मार तो सह लूँगा पर मंहगाई कैसे सहूँ ?
सिलिकन वेल्ली में रहना है तो हरदम यही कहूँ ...

बेशक लंगडी लूली हो कोई फियर नहीं है ,
वो भी क्या दुल्हन जो इंजीनियर नहीं है ?

इंजीनियर न सही , डॉक्टर ही सही,
दो तनखा के बिना तो गुजर डियर नहीं है !

हम लगे हुए थे बातों में,
ले कागज़ कुछ हाथों में ,
आई तमन्ना कुछ कहने ,
बड़े तंग कपड़े पहने....
जो निचे से कुछ ऊपर थे ,
और ऊपर से कुछ नीचे !
जी हाँ , बॉलीवुड ने हॉलीवुड को छोड़ दिया है पीछे !

मैंने कहा शान , मेरी बात मान,
घर की मुर्गी धर ले,
तू तमन्ना से ही शादी करले ,

शान तो चुप रहा पर तमन्ना बोली,
ये कैसी बातें खोली ?

शादी तो शादी है, कोई फास्ट फ़ूड नहीं है ,
वैसे भी शादी का मेरा मूड नहीं है !

लेकिन अगर तुम्हारा मित्र मेरा आधा किराया सह सकता है ,
तो मेरे साथ मेरे घर पर रह सकता है ...

बात साथ रहने कि ही है , शादी का क्या तर्क है ?
ऐसे रहें या वैसे , कोई फर्क है?

जी में आया दी चाटें में जड़ दूँ इसको आज,
पर ये नही तमन्ना , ये तो कह रहा है समाज !

घर घर में आज डिवोर्स हो रहे हैं !
स्कूल में सेक्स पर कोर्स हो रहे हैं ,
इराक में यू एस का फाॅर्स ढो रहे हैं,
और सारे प्रोजेक्ट इंडिया आउट सोर्स हो रहे हैं !

अंत में एक मंगल कामना के साथ विदा लेती हूँ-
अर्चना है यही कि भारतीय चेतना आपके करों में हो ,
आपकी या आपके बच्चों कि शादी अच्छे घरों में हो !

आप इस कविता की विडियो यहाँ देख सकते हैं -
http://www.youtube.com/watch?v=7kJ7nuV8wJc

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Sunday, August 31, 2008

मेरी सहेली

इसकी विडियो आप यहाँ देख सकते हैं-
http://www.youtube.com/watch?v=mY9hYl_0i8Y

ज़िन्दगी
भर उस से मेरी होड़ सी लगी रही,
वो पहेली, मेरी सहेली , निज रक्त सी सगी रही ,
बात करके आज उस से , मन लगा उड़ने वहां पर ,
घर द्वार , इस संसार से, हट के बसे दुनिया जहाँ पर ,

जल उठी मेरी मन की नारी , उस चंचला को देख कर ,
स्वयं को उस आकांक्षी से नापते लगता है डर ,
चले तो एक साथ थे , हम दोनों एक चाह में,
उच्च शिखरों के स्वप्न में , अभिलाषा के राह में ,

मेरी सखी, जिसने रखी, जो भी कहा सब कर गई ,
मैं तो जैसे , इतनी जल्दी, इस जीवन से डर गई ,
पच्चीस में ही पचास का एहसास जब होने लगे ,
उमंगें जब कर्तव्य के काँधें पे ही सोने लगे ,
जब स्वप्न से आकर भिडें धरातल की वो सच्चाइयाँ,
तोड़ दे तरंगों को जो संसार की परछाईयाँ,

तो विद्रोह कर उठ ता है मन की क्यों चडी उस डाल पर,
जहाँ पहुँच कर बस नहीं है , स्वयं अपना काल पर ,
जब नचाता है समय इंसान को निज ताल पर ,
देख हंस देता है मानव स्वयं अपने हाल पर ,

कहने लगी मेरी सखी क्या थी तू क्या हो गई ,
क्या तेरे सपनों की वो सारी कलियाँ खो गई ?
बादल, झरने, बरखा, पानी ,
तितली , छतरी , आसमानी ,
क्या तेरे जग जीतने की वो अभिलाषा खो गई ?
तू तो एक छोटे से घर की हो गई ,

उत्तर दिया मुड कर उसे मेरे विवेक ने गर्व से ,
हैं कम नहीं मेरे ये दिन त्यौहार या किसी पर्व से ,
जीता जगत तो क्या जीता , बन गए राजा तो क्या जानें ?
कर सको जीवन रचना , फूँक सको प्राण तो हम मानें !

पाया जो नारी का ये तन वात्सल्य प्रथम कर्तव्य है ,
आज ममता के ही दम से विश्व जनता सभ्य है ,
कर सकें हम गर किसी एक हृदय का शुद्ध विकास ,
तभी रास्ट्र निर्माण बन पायेगा सक्षम अविनाश ,

मत मान लो, घर द्वार मेरे स्वप्न का परित्याग है ,
मेरी आकांक्षा तो बड्नावल की वो आग है ,
कर्तव्य की प्राथमिकता अनुसार नारी ढलती है यहाँ ,
पर आकांक्षाएं तो संग संग चलती है यहाँ ,

पंचम में बृहस्पति अब मेरा गुरु हुआ है ,
अरे देखो ना , जीवन तो अभी शुरू हुआ है !
जो कहा था मैंने ना कर दूँ, अब वही तीर तो साधा है,
सब होगा सिद्ध अब जीवन में, ये मेरा तुमसे वादा है !

सुन मेरे ये वचन मेरी सखी अब मौन है ,
बंधुओं अब ये तो बूझो, वो सखी आख़िर कौन है ?
इस बात को कैसे कहूँ, इसी बात का तो दुःख है ,
वो कोई और नहीं मेरी तस्वीर का ही रुख है ,

रुख वह जो अब तक बचपन के उन ख़्वाबों में बंद है ,
जो उन्मुक्त है , आजाद है , स्वतंत्र है, स्वछन्द है ,
एक रुख ये है जो रखे है पहले जिम्मेदारियों को ,
प्रणाम करते हैं अंत में सब माँओं को सब नारियों को |

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Thursday, July 17, 2008

kavita kya hai?

"कविता क्या है ?"

एक सांचा रूप समाज का, एक ढांचा है ये आज का ,
कविता एक इतिहास है , देश , राष्ट्र , स्वराज का |
अकबर बाबर की गाथा ये रानी झाँसी की धार है ,
कविता है संस्कृति, यही साहित्य का श्रृंगार है |


कविता के ही पुण्य भूमि से प्रेम कभी उपजा था ,
और कभी ये मधु बाला के अधरों पर सजा था ,
रामायण की मर्यादा या महाभारत की आग हो ,
फीका है वह लेख जिसमे कविता की ना राग हो ,


हर कविता के मन्दिर में , एक मर्म की मूरत होती है ,
कविता लिखने की भी किंचित तीन ही सूरत होती हैं -
तीन कारणों से ही कविवर आते हैं ताव में ,
भाव में , अभाव में या शक्ति के प्रभाव में ...


कविता के बहाव का जो चाव रखते हैं ,
समंदर पे कागज़ की एक नाव रखते हैं ,
और फिर सोचते हैं , चलो पार कर लें ,
बस कवि ही ऐसा अद्भुत भाव रखते हैं |

Thursday, May 8, 2008

Naukri ki tokeri - नौकरी की टोकरी

करी करी नौकरी , नौ नौकरी करी ,
मरी मरी मैं मरी, जब भी नौकरी करी ,
दे दे के झूठे वादे , हरजाई मुख मोड़ गई ,
कभी मैंने छोडा उसे ,वो ही कभी छोड़ गई ,
ऊंची ऊंची डिग्रियों का , क्या मैं अब अचार करुँ ?
क्या बनेगा future मेरा, अब इसपे मैं विचार करुँ |

आई जो मैं पढ़ लिख के, BTech MBA कर के,
पहुँची अमरीका , कितने नयन में सपने धर के,
मेरा वो पहले इंटरव्यू , चक्रव्यू की चोटी ,
बिना वर्क परमिट के मैं उल्टे पाँव लौटी ,
मेरा अपराध घोर था, status मेरा H4 था ,

चार साल वनवास मैंने, जैसे तैसे भोगा,
आया जो ग्रीन कार्ड मैं झूमी, अब कुछ होगा ,
मैंने किए सारे तप, तब मिला एक startup,
मैंने कहा पैसे कम है, उसने कहा बस यही गम है ?
अगर तुम में दम है, काम किए जाओ , हम हैं ..


खैर , इरादा नेक था , मेरा वो पहले ब्रेक था,
मैंने की थी पूरी कोशिश, दिन रात एक कर डारी,
अब किस्मत को मैं क्या रोऊँ ,जो पाँव हो गया भारी,

बस, फिर क्या था ? फिर टूटी करीयर की डोरी,
बस गूंजी बच्चों की लोरी ,
दिन- साल- महीने गुज़र गए अब कोई करो उपाय ,
बच्चों के पालन के संग कौन नौकरी की जाए ?

सब R&D कर कर के, ये बात समझ है आई,
टीचर बन ने में ही अब तो होशियारी है भाई ,
बच्चों के ही संग जाना है, उनके ही संग आना,
दो पैसे तो घर में आयेंगे , हमने ख़ुद को ताना ,
पर टीचर बन ने को ,जो हुआ हमारा हाल ,
बज गए बाजा credentials में, लग गए पूरे दो साल ,
फिर मिली नौकरी पक्की , और चली समय की चक्की,

हुए बड़े कुछ बच्चे हाय , software फिर हमें बुलाये ,

बस एक नौकरी के पीछे सब लगा दिया है दम ,
लो outsource का दानव फिर ले आया है मातम ,

तंग गई में अमरीका में .बी.सी.दी (ABCD) बन कर ,
मैं ही आया , मैं ही बैरा , मैं ही कुक और ड्राईवर ,

उन बहनों के लिए ये संदेश मेरे पास है ,
जिनके दिलों में भी परदेस की ही आस है ,

जब आना इस ओर तो माँ या सासु माँ को ले आना ,
देखो बहना, हो पाये तो H4 पर मत आना ,
रखना तुम कंट्रोल अपने फॅमिली के प्लानिंग पर ,
वरना होगा रोना तुमको फूट फूट के धर के सर ,

कविता नहीं है, ये मेरे दिल की एक भडास है ,
पर इन आंसूओं में भी कहीं छुपी एक आस है ,

मैं हूँ नारी हिंद की और वक्त मेरा भी आएगा ,
जो निकल पड़ी मैं सर चढ़ के तो विश्व दंग रह जाएगा ,
तुम गाँठ बाँध लो सारा जग मेरी वाणी दोहराएगा ,
जिस किलकारी ने रोका था , अब वो ही हौसला बढायेगा !

America-अमरीका

मुकुराया देख हमने सोफे कुर्सी मेज़ को ,
भांति भांति के उपकरणों को , नई नवेली सेज को ,
हुए नहीं थे चार महीने भारत को छोडे हुए ,
घर से कोसों दूर , विदेशी सभ्यता ओढे हुए ,
उन दिनों भी मन के अन्दर कैसी वो आशाएं थीं ?
उमंगों की तरंगों की सतरंगी भाषाएँ थीं |

आए यहाँ तो रंगीली ये दुनिया हमको भा गई ,
ज्ञान विज्ञानं की इतनी प्रगति अपने दिल पर छा गई ,
लगे ठूंसने घर मैं अपने सामानों के भर ठेले ,
लगने लगे ठहाकों के मेरे घर पर भी मेले ,

अब तो इस धरती पर , इस हवा में तन रमने लगा ,
देख विदेशी चका-चौंध अपना भी मन जमने लगा ,

हो सकता है , अगली घर की यात्रा मन को भाये ,
पड़े रहें तब भी विदेशी चका-चौंध के ये साए ,

सम्भव हैं जाएँ हम भूल , निज देश की वह बंदगी,
धर्म भूलें कर्म भूलें, नज़र आए बस गन्दगी,

पर दिल के किसी कोने में अब भी एक आस है ,
घर भरा है किंतु मन में कमी का एहसास है ,

नहीं है तो बस नहीं है थपकियों का वो आँचल ,
खाने की मेज़ पे अपनों का वो कोलाहल ,
वो नाचने की धुन की मस्ती, गीतों का मधुर झंकार ,
वो प्यार वो तकरार , बच्चों सो जाओ की वो पुकार

अब तो अपने तेवर की करती है मिजाज़ पुर्सियाँ ,
ये कार ये टीवी ये मेज़ और ये कुर्सियाँ,

उन लोगों के लिए ये संदेश मेरे पास है ,
जिनके दिलों में भी परदेस की ही आस है

जब आना इस ओर तो थोडी माँ की खुशबू ले आना ,
बाँध सको तो गली मुहल्लों की आवाजें ले आना ,
संस्कृति इतनी लाना की आखरी वक्त तक साथ रहे ,
हो पाये तो मुट्ठी भर तुम देश प्रेम भी ले आना ,

मानों मेरी बात तभी तुम्हारा यहाँ दिल खिलेगा ,
क्योंकि इनमें से तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा,
कहीं नहीं मिलेगा , कभी नहीं मिलेगा |

kalaakaar- कलाकार

थे जबसे वो शौक शायराने हमें ,
थी ख्वाइश की दुनिया पहचाने हमें ,
गीतों को मेरे भी दुनिया सुने ,
अंधेरों से उठके उजाले बुने ,

थी वो आस मुझमें जो माने ना हार ,
जो गिर के भी बोले लो फिर एक बार ,
वो बचपना लिए बढ़ चले हम तो आगे ,
जाने कितने ही अरमां थे दिल में ये जागे ,

कोशिशें इतनी जाया हुई ये पूछो ,
चौखट पे सभीके मायूसी ही पायी ,
फिर ख़ुद को मनाया यही सोच कर ,
ज़रा धीरज रखो शुभ घड़ी देगा साईं ,

कोई चाचा या मामा या ताया नहीं ,
खींचने हमको आगे कोई आया नहीं,
ये खुदा की है रहमत कलम बोल उठी ,
क्या कसर इस ज़माने ने ढाया नहीं ....

है गर आग मुझमे कभी तो जलेगी ,
तपस्या मेरी ये कभी तो फलेगी ...

यही गम लिए चले जा रहे थे ,
किसी ने गली में पुकारा हमें ,

मुड के देखा वो चेहरा , बड़ा ही सुनहरा ,
पुछा हमने क्योंजी, क्यों पुकारा हमें ?


तुमको देना था कुछ , यूँ तो कुछ भी नहीं ,
दिल से मेरे एक नन्हा शुक्रिया ,
जब मैं हरा था जग से , था हरसू अँधेरा ,
गीतों ने तेरे था उजाला किया !

बस इतना ही कह चल दिया वो कहीं ,
पर दिल पर मेरे जैसे बिजली गिरी ,
मालूम था होगा इतना असर ,
है कलम में वो दम मेरी बुद्धि फिरि ,

छपे मेरे गीत कागजों पे तो क्या है ?
इंसानी दिलों पर तो पड़ती है छाप ,
अब बेहतर है क्या , ये इंसा या कागज़ ,
चलिए हमको अब ही बताएं ये आप !

Hind-Pak - हिंद-पाक

हिंद-पाक
जब बँटा मेरा था देश कभी ,
थे बड़े उदास ,हैरान सभी |
हर दिल का टुकडा लाख हुआ ,
कुछ हिंद हुआ , कुछ पाक हुआ ...

जिसके हिस्से जो भी आया ,
उसपर था बिछडों का साया,
क्या खूब सियासी शातिर थे ,
मज़हबी दांव में माहिर थे ,
उनको तो सत्ता पाना था ,
और अपनों को लड़वाना था ,

फिर हुआ , हुआ कैसा जूनून ,
क्यों बहा हर गली खून -खून ...
क्यों लाल रंग हर गाँव सना ,
कश्मीर दर्द का तनाव बना ...

सारी दुनिया अफ़सोस कहे ,
दो दुश्मन पास-पड़ोस रहे ,
वे दुश्मन जो भाई थे पर ,
रिश्ता टूटा जब छूटा घर ,


पर कुदरत की देखो माया ,
भूकंप भी ये कहाँ आया ,
दोनों देशों के बीचोंबीच ,
हम जिसे रहे लहू से सींच ,

कुदरत ने है आगाह किया ,
बन्दे ग़लत है राह लिया,
जा सुधर , बना ले रिश्ता फिर ,
ख़ुद जाए नज़रों से गिर ,

हो अच्छा गर फिर एक बार ,
बंधे दो देशों में प्यार ,
और अगर हम बन जाएँ एक,
दिल से सारे शिकवे फ़ेंक ,
तो सोचो कैसा होगा रंग,
कभी जंग हो अपनों के संग ,

कभी शहद बने , कभी नीम बने ,
क्या सही क्रिकेट की टीम बने ,
हों राम वहीँ, रहमान वहीँ ,
हो उनका अपमान कहीं ,

सब पंडित, मुल्ला, पीर बनें ,
हम सबका ही कश्मीर बने ,

गर एक कभी हम बन पायें ,
साड़ी दुनिया पे छा जाएँ ,
बस बात नज़रिए की है एक,
तू कोशिश कर के तो देख !

Wednesday, May 7, 2008

वैलेंटाइन डे

चौदह फरवरी सुबह हुई और बेटी आई मेरी,
मुस्काई और शरमा के उसने यूँ नज़रें फेरी,
समझ गई मैं हुई उसे फिर पैसों की दरकार ,
हाय ज़रूरत पर हो आता है अपनों को प्यार!

पूछा फिर भी मैंने उस से -बच्चे! everything is fine?
वो बोली - look mom ! today is valentine !

सौ बातें आई मन में कह डाली सब एक साथ,
माँ जो कभी कहती थी मुझसे दोहराई वो बात ,

"बच्चे चलना देख भाल के , दुनिया बड़ी फरेब,
रखना मर्यादा घर की, अपनी इज्ज़त, अपनी जेब"

"टाइम से खाना खा लेना, करते रहना फ़ोन "
"come on take it easy, just leave me alone!"

इस से पहले मैं कुछ पूछूं, पैसे लेकर वो चल दी,
आज कल के बच्चों को हरदम रहती है जल्दी,

मैं भागी मेरे अपने अजी सुनते हो के पास,
दौड़ भाग टेंशन चिंता से फूल चुकी थी साँस,

"सुनो, सुनो बेटी के लक्षण , मुझपे तो बिजली टूटी है ,
कहती है वैलेंटाइन है, अभी अंडे से नहीं फूटी है ! "

धीरज से समझाओ मुझको ओ बीवी ऑफ़ माइन,
कैसा है बतंगड़ ये, कैसा ये वैलेंटाइन?

"सुनते थे हम भी कॉलेज में है कुछ ऐसा रोग,
हंगामा सा करते थे, आशिक दीवाने लोग,

हर सुंदरी को लव यू लिखकर कर देते थे साइन,
भूलें चाहे होली दिवाली, पालें वैलेंटाइन"

"हँसी करते हो, मैंने कहा हँसी करते हो?
मेरी तो जान ही जायेगी,
कल जब बेटी घर में बॉय -फ्रेंड लेकर आएगी".....

कहा इन्होने -रोम में बन जाओ रोमन,
करो ज़रा तुम ब्रॉड माईंड, नहीं होगी उलझन,

कितना करुँ में ब्रॉड माईंड , कैसे करुँ में ब्रॉड माईंड मां हूँ न,
हो कोई नुक्सान किसी का चाहूँ न,

आने वाले थे कुछ आँसू आंखों में,
चमक उठा कुछ खिड़की की सलाखों में,
देखा टेबल पर नया कुछ रखा है,
बड़े सुनहरे कागज़ से वो ढक्का है,

खोला कवर जो गिफ्ट का , सब टेंशन हो गए एंड(end),
लिखा था उसपर , "mom , you are my best friend"
शिक्षा उस दिन थी जो पाई, भूल नहीं पाऊँगी मैं,
होगा जब भी culture conflict यही गीत गाऊँगी मैं,
जितना हम अपने बच्चों पर विश्वास करेंगे,
उतना ही उनको दिल से हम पास करेंगे,
बनके उनके ही जैसा आओ प्यार को जोडें ,
ये conservative attitude , ये दकियानूसी छोडें,

दिलों के इस पर्व में आओ खुशियों से मेल करें ,
हर नियर और डियर वन को फ़ोन या ईमेल करें !

मेरी सहेली

ज़िन्दगी भर उस से मेरी होड़ सी लगी रही,
वो पहेली, मेरी सहेली , निज रक्त सी सगी रही ,
बात करके आज उस से , मन लगा उड़ने वहां पर ,
घर द्वार , इस संसार से, हट के बसे दुनिया जहाँ पर ,

जल उठी मेरी मन की नारी , उस चंचला को देख कर ,
स्वयं को उस आकांक्षी से नापते लगता है डर ,
चले तो एक साथ थे , हम दोनों एक चाह में,
उच्च शिखरों के स्वप्न में , अभिलाषा के राह में ,

मेरी सखी, जिसने रखी, जो भी कहा सब कर गई ,
मैं तो जैसे , इतनी जल्दी, इस जीवन से डर गई ,
पच्चीस में ही पचास का एहसास जब होने लगे ,
उमंगें जब कर्तव्य के काँधें पे ही सोने लगे ,
जब स्वप्न से आकर भिडें धरातल की वो सच्चाइयाँ,
तोड़ दे तरंगों को जो संसार की परछाईयाँ,

तो विद्रोह कर उठ ता है मन की क्यों चडी उस डाल पर,
जहाँ पहुँच कर बस नहीं है , स्वयं अपना काल पर ,
जब नचाता है समय इंसान को निज ताल पर ,
देख हंस देता है मानव स्वयं अपने हाल पर ,

कहने लगी मेरी सखी क्या थी तू क्या हो गई ,
क्या तेरे सपनों की वो सारी कलियाँ खो गई ?
बादल, झरने, बरखा, पानी ,
तितली , छतरी , आसमानी ,
क्या तेरे जग जीतने की वो अभिलाषा खो गई ?
तू तो एक छोटे से घर की हो गई ,

उत्तर दिया मुड कर उसे मेरे विवेक ने गर्व से ,
हैं कम नहीं मेरे ये दिन त्यौहार या किसी पर्व से ,
जीता जगत तो क्या जीता , बन गए राजा तो क्या जानें ?
कर सको जीवन रचना , फूँक सको प्राण तो हम मानें !

पाया जो नारी का ये तन वात्सल्य प्रथम कर्तव्य है ,
आज ममता के ही दम से विश्व जनता सभ्य है ,
कर सकें हम गर किसी एक हृदय का शुद्ध विकास ,
तभी रास्ट्र निर्माण बन पायेगा सक्षम अविनाश ,

मत मान लो, घर द्वार मेरे स्वप्न का परित्याग है ,
मेरी आकांक्षा तो बड्नावल की वो आग है ,
कर्तव्य की प्राथमिकता अनुसार नारी ढलती है यहाँ ,
पर आकांक्षाएं तो संग संग चलती है यहाँ ,

पंचम में बृहस्पति अब मेरा गुरु हुआ है ,
अरे देखो ना , जीवन तो अभी शुरू हुआ है !
जो कहा था मैंने ना कर दूँ, अब वही तीर तो साधा है,
सब होगा सिद्ध अब जीवन में, ये मेरा तुमसे वादा है !

सुन मेरे ये वचन मेरी सखी अब मौन है ,
बंधुओं अब ये तो बूझो, वो सखी आख़िर कौन है ?
इस बात को कैसे कहूँ, इसी बात का तो दुःख है ,
वो कोई और नहीं मेरी तस्वीर का ही रुख है ,

रुख वह जो अब तक बचपन के उन ख़्वाबों में बंद है ,
जो उन्मुक्त है , आजाद है , स्वतंत्र है, स्वछन्द है ,
एक रुख ये है जो रखे है पहले जिम्मेदारियों को ,
प्रणाम करते हैं अंत में सब माँओं को सब नारियों को |

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