खबर तकें वो , भेज के पैगाम प्यार का...
कुछ लीजिये हुज़ूर ! लुत्फ़ इंतज़ार का....
जो गाँव से आये थे तो मिलते गले थे हम ,
अब फासला संभालिये इस शहरी यार का....
(c)Archana//
khabar taken wo, bhej ke paigam pyar ka...
kuch lijiye Huzoor! lutf intazaar ka....
jo gaanv se aaye the to milte gale the hum....
ab faasla sambhaaliye is shahari yaar ka.....
(c)Archana//
Wednesday, March 31, 2010
लिखती रहो तुम , आपके इस चाह के सदके ,
हमारी आह पर मचली हरेक उस वाह के सदके,
जहाँ पर साफ़ कर आये हैं जाके, सब गुनाह-ए-जुर्म ,
ऐसी पाकीजगी, ऐसे इबादत गाह के सदके .....
(C) Archana
Likhti raho तुम aapke is chah ke sadke ,
hamari aah pe machali harek us WAh ke sadke,
jahan par saaf kar aaye hain jaake, sab gunaah-e-jurm ,
aisi paakeezagi, aise ibaadatgaah ke sadke....
(C) Archana
मुस्कानों की कीमत, रिश्तों की व्यापारी सीख गयी,
बाजारों के जैसे, कैसे बदले यारी सीख गयी ...
बड़ा नाज़ था मुझे कभी, के दिल का मोल नहीं होता,
तेरे प्यार में यारा मैं तो दुनियादारी सीख गयी ...
(c)Archana
Muskaanon ki kimat, Rishton ki Vyapaari seekh gayi...
Bazaron ke jaise, kaise badle yaari seekh gayi.....
bada naaz tha mujhe kabhi ki dil ka mol nahin hota....
tere pyar mein yara main to Duniyadaari seekh gayi...
(c)Archana
बाजारों के जैसे, कैसे बदले यारी सीख गयी ...
बड़ा नाज़ था मुझे कभी, के दिल का मोल नहीं होता,
तेरे प्यार में यारा मैं तो दुनियादारी सीख गयी ...
(c)Archana
Muskaanon ki kimat, Rishton ki Vyapaari seekh gayi...
Bazaron ke jaise, kaise badle yaari seekh gayi.....
bada naaz tha mujhe kabhi ki dil ka mol nahin hota....
tere pyar mein yara main to Duniyadaari seekh gayi...
(c)Archana
Tuesday, March 9, 2010
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खुद की गलती पे हमें माफ़ किये जाते हैं ,
चेहरे पे धूल, आइना साफ़ किये जाते हैं,
आप ही कातिल मेरे और आप ही मुंसिफ बने ,
वल्लाह ! क्या खूब इन्साफ किये जाते हैं....
khud ki galti pe hamen maaf kiye jaate hain,
chehre pe dhool, aina saaf kiye jaate hain,
aap hi qaatil mere aur aap hi munsif bane,
wallah! kya khoob insaaf kiye jaate hain...
(c)Archana
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Monday, January 4, 2010
Monday, December 21, 2009
प्रवासी हैं , कुबेर नहीं ,!
Watch video for this poem at-
http://www.youtube.com/watch?v=TFZb_tsV0oc
कई दिन पहले आया मुझको इंडिया से एक फोन,
मैंने पूछा बड़े प्यार से भाई तुम हो कौन,
उत्तर था साहित्य सम्मलेन करना एक है ,
मैंने कहा - आईडिया बड़ा ही नेक है ,
आया सवाल - क्या आप अपनी कोई रचना गा पाएँगी?
आप इसके हेतु भारत आ पाएँगी?
मारे ख़ुशी के कैसी कैसी भावनाएं जुड़ने लगी,
और बिना पंख ही मैं जैसे हवा में उड़ने लगी ,
लेकिन ज्यूँ ही ख्वाबों में प्लान मेरा बन गया,
रोटी, पानी, घर, बच्चों का आकर सवाल फिर तन गया,
मैं तब हारा हम के आगे, की मैंने उनसे बिनती,
है ज़िम्मेदारी, आयोजन में करें न मेरी गिनती,
कुछ चुप्पी के बाद श्रीमान डोले, और धीरे से बोले,
साहित्य की सेवा का मान कीजिये,
प्रवासी हैं , बढ़ चढ़ कर दान कीजिये,
इस पुनीत कार्य के ही योग सही,
आप नहीं आप का सहयोग सही !
ऐसी सोलिड मार्केटिंग के आगे मैं झुक गयी,
पर इस से पहले मैं कुछ भेजूं, मैं रुक गयी,
कितना, कैसे, क्यों, कहाँ , ज़ेहन में बात ये आई थी,
ज्यादा थोडा, जितना जोड़ा, सब मेहनत की कमाई थी,
आये इतने फोन की दर के मारे मैं गढ़ जाती थी,
लगता था हर बार किसी की उम्मीदें बढ़ जाती थी,
फिर मुझसे बन पाया जो भी मैंने भेजा उसके पास,
सोचा कुछ तो मदद मिलेगी, धन्यवाद की थी एक आस,
अपेक्षित से कम मिलने पर वह टूटा नहीं था,
निष्ठुर था, निर्भीक अति पर झूठा नहीं था,
करेले पे नीम का तेल ज्यूँ,
आया उसका अगला ईमेल यूं,
जी आपके इस चेक पे जो अंक है,
प्रवासी के नाम पे कलंक है,
सोचें, आपके प्रवास का क्या साख होता,
जो दान के इस चेक से रूपया लाख होता,
सुनकर मुझको हुआ अचम्भा, डॉलर की हम ढेर नहीं,
समझाऊँ तुमको कैसे, प्रवासी हैं , कुबेर नहीं ,
एक से पैंतालिस के दर का गाँव में मेरे चर्चा है,
वो न जानें, दर पैंतालिस का ही सारा खर्चा है,
टैक्स, हेल्थ, और इन्सुरांस का बोझ उठाना पड़ता है,
घर, गाडी, इंडिया टिकटों पर कितना लुटाना पड़ता है,
एकल, प्रथम, CRY और आशा, सब गायें भारत की भाषा,
दीन हीन, भुकमरी, गरीबी, लाचारी का भव्य तमाशा,
और आप सब देकर डॉलर,
ऊंची करते अपनी कॉलर,
शिक्षा अपने देश में पाकर,
बसे मगर परदेस में आकर,
दिलों में जलन, आँखों में नमी है,
हाँ यहाँ भी कमी है, यहाँ भी कमी है ,
अब मैं भी नींद से जागूंगी,
और भारत से कुछ मांगूंगी,
स्वप्न पूर्ण निशा दो, जीवन में दिशा दो,
दो मीठे बोल दो, प्यार ही में तोल दो,
प्रवासी का स्थान से ही मान नहीं हो,
अमरीका ही मेरी पहचान नहीं हो,
भाग्य ने देश बहार धकेला है,
यहाँ हर प्रवासी कितना अकेला है,
अब इस दीन को भी जीवन में प्यार चाहिए,
अपनों के बाहों का हार चाहिए,
सबको NRI लगता मीठा ढोकला है,
पर भीतर से प्रवासी सचमुच में खोखला है,
पूरा ही खोखला है ..........
http://www.youtube.com/watch?v=TFZb_tsV0oc
कई दिन पहले आया मुझको इंडिया से एक फोन,
मैंने पूछा बड़े प्यार से भाई तुम हो कौन,
उत्तर था साहित्य सम्मलेन करना एक है ,
मैंने कहा - आईडिया बड़ा ही नेक है ,
आया सवाल - क्या आप अपनी कोई रचना गा पाएँगी?
आप इसके हेतु भारत आ पाएँगी?
मारे ख़ुशी के कैसी कैसी भावनाएं जुड़ने लगी,
और बिना पंख ही मैं जैसे हवा में उड़ने लगी ,
लेकिन ज्यूँ ही ख्वाबों में प्लान मेरा बन गया,
रोटी, पानी, घर, बच्चों का आकर सवाल फिर तन गया,
मैं तब हारा हम के आगे, की मैंने उनसे बिनती,
है ज़िम्मेदारी, आयोजन में करें न मेरी गिनती,
कुछ चुप्पी के बाद श्रीमान डोले, और धीरे से बोले,
साहित्य की सेवा का मान कीजिये,
प्रवासी हैं , बढ़ चढ़ कर दान कीजिये,
इस पुनीत कार्य के ही योग सही,
आप नहीं आप का सहयोग सही !
ऐसी सोलिड मार्केटिंग के आगे मैं झुक गयी,
पर इस से पहले मैं कुछ भेजूं, मैं रुक गयी,
कितना, कैसे, क्यों, कहाँ , ज़ेहन में बात ये आई थी,
ज्यादा थोडा, जितना जोड़ा, सब मेहनत की कमाई थी,
आये इतने फोन की दर के मारे मैं गढ़ जाती थी,
लगता था हर बार किसी की उम्मीदें बढ़ जाती थी,
फिर मुझसे बन पाया जो भी मैंने भेजा उसके पास,
सोचा कुछ तो मदद मिलेगी, धन्यवाद की थी एक आस,
अपेक्षित से कम मिलने पर वह टूटा नहीं था,
निष्ठुर था, निर्भीक अति पर झूठा नहीं था,
करेले पे नीम का तेल ज्यूँ,
आया उसका अगला ईमेल यूं,
जी आपके इस चेक पे जो अंक है,
प्रवासी के नाम पे कलंक है,
सोचें, आपके प्रवास का क्या साख होता,
जो दान के इस चेक से रूपया लाख होता,
सुनकर मुझको हुआ अचम्भा, डॉलर की हम ढेर नहीं,
समझाऊँ तुमको कैसे, प्रवासी हैं , कुबेर नहीं ,
एक से पैंतालिस के दर का गाँव में मेरे चर्चा है,
वो न जानें, दर पैंतालिस का ही सारा खर्चा है,
टैक्स, हेल्थ, और इन्सुरांस का बोझ उठाना पड़ता है,
घर, गाडी, इंडिया टिकटों पर कितना लुटाना पड़ता है,
एकल, प्रथम, CRY और आशा, सब गायें भारत की भाषा,
दीन हीन, भुकमरी, गरीबी, लाचारी का भव्य तमाशा,
और आप सब देकर डॉलर,
ऊंची करते अपनी कॉलर,
शिक्षा अपने देश में पाकर,
बसे मगर परदेस में आकर,
दिलों में जलन, आँखों में नमी है,
हाँ यहाँ भी कमी है, यहाँ भी कमी है ,
अब मैं भी नींद से जागूंगी,
और भारत से कुछ मांगूंगी,
स्वप्न पूर्ण निशा दो, जीवन में दिशा दो,
दो मीठे बोल दो, प्यार ही में तोल दो,
प्रवासी का स्थान से ही मान नहीं हो,
अमरीका ही मेरी पहचान नहीं हो,
भाग्य ने देश बहार धकेला है,
यहाँ हर प्रवासी कितना अकेला है,
अब इस दीन को भी जीवन में प्यार चाहिए,
अपनों के बाहों का हार चाहिए,
सबको NRI लगता मीठा ढोकला है,
पर भीतर से प्रवासी सचमुच में खोखला है,
पूरा ही खोखला है ..........
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