Friday, September 26, 2008

फिर ज़िन्दगी के दांव पेंच चलने लगे हैं !

किस राह पे हम आज यूँ ही चलने लगे हैं ?
आप ही के रंग में क्यूँ ढलने लगे हैं?

मोम का जिगर है तो बचें जी आग से,
हाय ! क्या करें जो आह से पिघलने लगे हैं ....

गरूर था कि आपको भी अपने सा बना देंगे,
अब ख़ुद को देख , हाथ अपने मलने लगे हैं ...

बताये ये कोई हमें , क्या ठीक , क्या ग़लत है?
फिर ज़िन्दगी के दांव पेंच चलने लगे हैं ....

जी चाहता है आज लिखें यक नया फ़साना ,
आ आ के लफ्ज़ कागजों पे टलने लगे हैं ......

चल फिर कोई ठोकर लगा, कर दे लहू लुहान,
ए ज़िन्दगी हम आज फिर संभलने लगे हैं ,

आपकी,
-अर्चना

Sunday, September 14, 2008

हिन्दी -Hindi

इसकी विडियो आप यहाँ देख सकते हैं-
http://www.youtube. com/watch? v=OPQ3ihoZsjo

हिन्दी हिन्दी करते हैं , कहने से डरते हैं,
Hindi don't know का बड़ा आम डायलोग है !
Hindi I love, but cannot say it अब ,
अंग्रेज़ी झाड़ने का बड़ा फैला आज रोग है !

कैसे रहे साथ ये जो बोलना न चाहें इसे,
दाम इसका तो अजी इसका प्रयोग है ,
दुनिया जो पाना चाहे , आप ही गंवाना चाहें ,
खोई पूँजी जानके ये कैसा संजोग है ,

आप ही जो न बोलेंगे, बच्चों से क्या आशा होगी,
अपनी सभ्यता को बच्चे नहीं तोल पाएंगे,
भूल नहीं इनकी , ये ज़िम्मेदारी है हमारी,
बच्चे भारतीयता में नहीं डोल पाएंगे,
बच्चों को जो ना दी हिन्दी ज्योति, हिन्दी बोली बोलो,
द्वार हिन्दी साहित्यों के कैसे खोल पाएंगे ?
कितने ही अंग्रेज़ी हाय- हेल्लो कर लें जी,
दादा- दादी संग ये तो नहीं बोल पाएंगे ......


इसे कठिन मनाना नहीं , माँ है अपना ही लेगी,
हाथों में तुम्हारी अब इसकी है लाज हो ,
गर्व रहे इसपे जी, भारत की बिंदी हिन्दी,
अमेरिका में ना छूटे इसका वो ताज हो,
ठान लें जो मन में की कोशिश करेंगे पूरी,
स्वाभिमान मात्र वाणी पर तुम्हें आज हो,
है ये पहचान मेरी, आन मेरी ,शान मेरी,
बोली पे हमेशा अब हिन्दी का ही राज हो !

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

Friday, September 5, 2008

चाँद - चकोर

किसी गुलसितां में चहकती थी हरदम ,
दो आंखों में उसकी महकती थी शबनम ,
सभी फूल पाती उसी पर फ़िदा थे ,
जो गूंजे सदा में उसी की सदा थे |

थी लाडो सभी की चहेती चकोर ,
कूदती भागती थी वो चारों ही ओर,
था मासूम दिल ऐसा , भोली सी सूरत ,
थी उसके लिए ये जहाँ खूबसूरत ,

एक दिन जो नज़र आसमां पर पड़ी ,
चाँद के चेहरे से उसकी आँखें लड़ी,
देखती ही रही कुछ भी बोले वो ,
मुस्कुराये मगर राज़ खोले वो ,

फिर कहा उसने ये बड़े दांव से,
चाँद ला दो मुझे आसमां गाँव से ,
सब हँसे चल रे पगली जिद नहीं ऐसे करते ,
कभी तारों को देखा ज़मीं पे उतरते,

अगर वो ज़मीं पे सकता नहीं ,
तो मैं क्यों ख़ुद ही उस जाऊं वहीँ ,
यहीं तो दिखे है , उठाओ नज़र ,
हाथों से छूलूं , जो बढाऊं अगर ,

सब ये बोले जो दिखता है होता नहीं,
रेत के ढेर में पानी सोता नहीं ,
इश्क़ में कौन दुनिया में रोता नहीं ,
जो समझता है सपने पिरोता नहीं....


मानी उडी उड़ चली वो चकोर ,
दोनों पंख खोले वो अम्बर की ओर ,
दिन ही को देखा , रातों को जाना,
गर्मी सर्दी, हवा का ठिकाना ,

जो टूटा बुलंदी से दम आखरी,
तो प्यासी वो आके ज़मीं पे गिरी ,
अपने उजडे पंखों को मींचे हुए
पहुँची प्यासी पोखर साँस खींचे हुए ,

देखा जो पानी में था चाँद एक,
आई जान वापस , दिया मौत फ़ेंक ,
गई वो समझ दुनिया दारी को आज ,
लो तुम भी सुनो उस चकोरी का राज़ ,

जो ख्वाइश करो तुम कभी चाँद की ,
अपने घर में पानी का घडा डालना ,
जो सच्ची हो चाहत झुके आसमां,
हमसफ़र दिल तुम ज़रा बड़ा पालना |

Thursday, September 4, 2008

गंगा मौसी !

धन्यवाद देती हूँ श्री शरद तैलंग जी को जिन्होंने इस कविता की खामियां निकाल कर इसे तराशा है | इस कविता की पूर्णता में शरदजी का बहुत बड़ा हाथ है |
धन्यवाद शरदजी !

किसी देश में नदी किनारे , था मेरा एक गाँव,
धेनु, धरा , धन, धाम प्रचुर था, थी पीपल की छाँव,

उसी गाँव में मेरी प्यारी गंगा मौसी रहती थी,
था कोई न रिश्ता उनसे, यूँ ही मौसी कहती थी ,

हर गर्मी में गाँव जो जाती मैं उनसे ही खेली थी,
मैं थी नौ की, बीस की वो थीं, मेरी वही सहेली थीं,

याद है मुझको वो गर्मी , मौसी की हुई सगाई थी ,
मेरी मौसी गाँव के सबसे ऊंचे घर में ब्याही थी,

स्वर्ण जडित गहनों में , मेरी मौसी रमा सरीखी थी ,
लेकिन जाने क्यों उनकी मुस्कान बहुत ही फीकी थी ?

अगली गर्मी की छुट्टी में मौसी घर लाला आया,
इक प्यासे के घर में जैसे अमृत का प्याला आया

अनपढ़ मौसी के कहने पर ही शिक्षा का फूल खिला .
उनकी शुभ दृष्टि से गाँव को प्रथम एक स्कूल मिला .

तब स्कूल में शिक्षक आए एक, ज्ञान से थे भरपूर,
अनुपम तेज था चेहरे पर , सब चिंताओं से वो थे दूर,

मौसी ने अपनी भी शिक्षा , बड़े शौक से करवाई
कितना रोई मैं जब, उनकी पहली चिट्टी घर आई

मेरी भी कॉलेज की अब , तैयारियां जोरों पे थी,
मेरी जैसे सालों की , प्रतियोगिता औरों से थी ,

अबकी गर्मी मौसी को पहचान नही मैं पाई थी,
कितनी आभा थी उनमें जब मुझसे मिलने आई थी ....

कुंदन जैसा रंग था उनका बालक सी थी चंचलता
रूप कमल सा खिला खिला और नैनों में थी संबलता l

मैंने पूछा मौसी से - क्या शिक्षा से ये पाया है?
वो मुस्काई, बोली -"पगली, मन में प्रेम समाया है" .

ज्ञान के ही सागर ने ,मेरे इस जीवन को है छुआ ,
पता नहीं कब, क्यों और कैसे, पर कुछ तो है अवश्य हुआ !

मैं चौंकी थी -"ओ मौसी ! तू भी तो बस ह्द करती है
अपनों को तो छोड़ दिया अब तू गैरों पे मरती है !

तू भगिनी, तनया भार्या है, तू ममता है, जाया है
फिर राधा मीरा के जैसा, कैसा रूप बनाया है?

वो बोली- मेरा विवेक न जाने भाव में कहाँ खो गया ?
मैंने तो कुछ किया नहीं, बस ये तो अपने आप हो गया !

पर मेरे ये संस्कार हैं , मर्यादा न छोडूंगी
अपने कर्तव्यों से भी मैं, कभी नहीं मुंह मोडूंगी

पर बतलाओ क्या खुशियों पर मेरा कुछ अधिकार नहीं?
कैसा नीरस बोझिल जीवन, जिसमे सच्चा प्यार नहीं..

मैंने सोचा देखूं मौसी की क्यों ऐसी मति हुई ?
और प्रेम के मार्ग पर उसकी , आज कहाँ तक गति हुई ?

अगले दिन देखा जब शिक्षक आए , उन्हें पढाने भाषा ,
देख रही थी मैं उनमें थी , भरी हुई अद्भुत अभिलाषा ,

इक मोटा सा परदा उन दोनों के बीच में तना खड़ा-
हया शर्म संकोच का पहरा- उस से भी था बहुत बड़ा !

देख रहे थे इक- दूजे को, फिर भी कैसे तृष्ण रहे-!
मेरे आगे मानो जैसे स्वयम ही राधा कृष्ण रहे .

ऐसी निर्मल प्रेम कथा को जाने किसकी नज़र लगी-?
प्रेम की दुश्मन दुनिया बन गई , उसको ये जब ख़बर लगी .

मौसी की आजादी पर फिर पाबंदों की पाश मिली,
विद्या के विद्याधर की पटरी के ऊपर लाश मिली,

याद मुझे है आज भी वो दिन, जब मेरा कौतुक जागा
सारा गाँव न्याय करने को था पचांयत में लागा !

कहलाई थी गंगा मौसी, कुलक्षनी , डायन कुलटा,
एक सीता समान नारी का, भाग्य हाय कैसा पलटा ?

फिर पंचों ने सोच समझ कर एक फ़ैसला था तोला ,
सब हो माफ़ तुझे जो "माफ़ी मांगे" , सबने ये बोला

मौसी ने जो कहा वहाँ - सब गाँव उसी से था गूंजा,
प्रेम किया है स्वच्छ हृदय से , ये ही बस मेरी पूजा,

चोरी नहीं , डकैती न की , नहीं दिखाई शक्ति है,
मर्यादा न तोडी है , ये मात्र हृदय की भक्ति है !

क्षमा जो मांगूंगी तो मेरा प्रेम यहाँ लज्जित होगा ,
इसकी खातिर मृत्यु भी आए , अंत मेरा सज्जित होगा ।

क्या अपराध ? दोष क्या मेरा ? , इससे किसको है हानि ?
क्या है ये अपराध अदम्य ,जो कही प्रेम की है बानी !

मीरा के गुण गाते हो तुम, राधा की करते पूजा
अपने ही आँगन में क्यों व्यवहार किया करते दूजा ?

तुमने तो व्यापार बनाया सब भावुक संबंधों को
हर रिश्ते के साथ बाँध कर इन झूठे अनुबंधों को

आज तुम्हें मैं जगा सकूं तो स्वयं आज मैं जागूंगी.
माफ़ करें , पर प्रेम की खातिर मैं माफ़ी न मांगूंगी !

जिसने चाहा ये समाज जागे , ख़ुद वो ही सो गई,
पर मर कर भी मौसी मेरी अमर सदा को हो गई !!!!