Wednesday, December 29, 2010

मेरी कुट्टी तुमसे कान्हा
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मैने माना , रे कान्हा, दुनिया पल का आना- जाना,
पर है ठाना, दूँगी ताना, अब फिर जो तूने माना,
तूने राधा के संग बाँधा ,हो आधा पर प्रेम को साधा ,
बोल, ये जो प्यार है... केवल देवों का अधिकार है ?
जिसका रूप, ना आकार है ...
निर्विघ्न चीत्कार है ...
बिन अस्त्र का प्रहार है..
समय की मार .. हर बार की हार ... मात्र हाहाकार.....
क्या
केवल देवों का अधिकार है?
किन्तु अब मेरी बारी है, अब पूरी ही तैयारी है ...
टूट गयी है शक्ति, मेरी अर्चना नहीं हारी है...

सुन ले.....जब तक प्राप्त नहीं अब प्यार है,
जिस
पर मेरा अधिकार है !
तेरी पूजा नहीं स्वीकार है ...

दूँगी ताना, अब है ठाना, जो तू मेरी बात माना,
मेरी कुट्टी तुमसे कान्हा ....

1 comment:

vtiru said...

Hi Archana
Loved this poem... As always true with all your poems
Vidya