Sunday, August 31, 2008

मेरी सहेली

इसकी विडियो आप यहाँ देख सकते हैं-
http://www.youtube.com/watch?v=mY9hYl_0i8Y

ज़िन्दगी
भर उस से मेरी होड़ सी लगी रही,
वो पहेली, मेरी सहेली , निज रक्त सी सगी रही ,
बात करके आज उस से , मन लगा उड़ने वहां पर ,
घर द्वार , इस संसार से, हट के बसे दुनिया जहाँ पर ,

जल उठी मेरी मन की नारी , उस चंचला को देख कर ,
स्वयं को उस आकांक्षी से नापते लगता है डर ,
चले तो एक साथ थे , हम दोनों एक चाह में,
उच्च शिखरों के स्वप्न में , अभिलाषा के राह में ,

मेरी सखी, जिसने रखी, जो भी कहा सब कर गई ,
मैं तो जैसे , इतनी जल्दी, इस जीवन से डर गई ,
पच्चीस में ही पचास का एहसास जब होने लगे ,
उमंगें जब कर्तव्य के काँधें पे ही सोने लगे ,
जब स्वप्न से आकर भिडें धरातल की वो सच्चाइयाँ,
तोड़ दे तरंगों को जो संसार की परछाईयाँ,

तो विद्रोह कर उठ ता है मन की क्यों चडी उस डाल पर,
जहाँ पहुँच कर बस नहीं है , स्वयं अपना काल पर ,
जब नचाता है समय इंसान को निज ताल पर ,
देख हंस देता है मानव स्वयं अपने हाल पर ,

कहने लगी मेरी सखी क्या थी तू क्या हो गई ,
क्या तेरे सपनों की वो सारी कलियाँ खो गई ?
बादल, झरने, बरखा, पानी ,
तितली , छतरी , आसमानी ,
क्या तेरे जग जीतने की वो अभिलाषा खो गई ?
तू तो एक छोटे से घर की हो गई ,

उत्तर दिया मुड कर उसे मेरे विवेक ने गर्व से ,
हैं कम नहीं मेरे ये दिन त्यौहार या किसी पर्व से ,
जीता जगत तो क्या जीता , बन गए राजा तो क्या जानें ?
कर सको जीवन रचना , फूँक सको प्राण तो हम मानें !

पाया जो नारी का ये तन वात्सल्य प्रथम कर्तव्य है ,
आज ममता के ही दम से विश्व जनता सभ्य है ,
कर सकें हम गर किसी एक हृदय का शुद्ध विकास ,
तभी रास्ट्र निर्माण बन पायेगा सक्षम अविनाश ,

मत मान लो, घर द्वार मेरे स्वप्न का परित्याग है ,
मेरी आकांक्षा तो बड्नावल की वो आग है ,
कर्तव्य की प्राथमिकता अनुसार नारी ढलती है यहाँ ,
पर आकांक्षाएं तो संग संग चलती है यहाँ ,

पंचम में बृहस्पति अब मेरा गुरु हुआ है ,
अरे देखो ना , जीवन तो अभी शुरू हुआ है !
जो कहा था मैंने ना कर दूँ, अब वही तीर तो साधा है,
सब होगा सिद्ध अब जीवन में, ये मेरा तुमसे वादा है !

सुन मेरे ये वचन मेरी सखी अब मौन है ,
बंधुओं अब ये तो बूझो, वो सखी आख़िर कौन है ?
इस बात को कैसे कहूँ, इसी बात का तो दुःख है ,
वो कोई और नहीं मेरी तस्वीर का ही रुख है ,

रुख वह जो अब तक बचपन के उन ख़्वाबों में बंद है ,
जो उन्मुक्त है , आजाद है , स्वतंत्र है, स्वछन्द है ,
एक रुख ये है जो रखे है पहले जिम्मेदारियों को ,
प्रणाम करते हैं अंत में सब माँओं को सब नारियों को |

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2 comments:

सुनीता शानू said...

अर्चना जी, क्या बात है,एक सखी का कितना खूबसूरत चित्रण है आपकी कविता...सादर

आनंदकृष्ण said...

अर्चना जी,
जिस भाव-बिन्दु को केन्द्र में ले कर आपने ये रचना रची है वह एक गहन मनोवैज्ञानिक यथार्थ है.

कविता में जो "सखी" है उसके लिए हिन्दी में कोई सही-सटीक शब्द मुझे याद नहीं आता पर फारसी का एक शब्द है "हमजाद" जो इस सखी को पूर्णतः व्याख्यायित करने में सक्षम है. इसका अर्थ है- हम=साथ और जाद= उत्पन्न. अतः अर्थ हुआ- साथ उत्पन्न हुआ. (कृपया ध्यान दें कि ये सहोदर से भिन्न है)

"हमजाद" की अवधारणा के अनुसार प्रत्येक प्राणी के जन्म के साथ ही उसका हमजाद भी जन्म लेता है जो हर दृष्टि से उस प्राणी के गुण-दोषों से विपरीत होता है. जैसे वो प्राणी दृश्यमान होता है तो उसका हमजाद अदृश्य. इसी प्रकार अन्य गुणों-दोषों के बारे में भी. हमजाद हमेशा हमारे साथ रहता है. कई बार हम जब हमजाद के प्रभाव में होते हैं तो हम कई ऐसे कार्य या निर्णय कर लेते हैं जो हमारी प्रकृति के सर्वथा विपरीत होते हैं.

मुझे लगता है की हमजाद की अवधारणा के पीछे मानव की पूर्णत्व के प्रति आस्था, लगाव और आकर्षण है. हमजाद के माध्यम से वो अपनी खामियों का संतुलन तलाशता है. कई बार हम अपने किसी प्रिय के "हमजाद" से तादात्म्य बना लेते हैं उसके पीछे भी यही कारण प्रतीत होता है की हम अपने प्रिय की कमियों को सहन नहीं कर पाते और उस कमियों से रहित व्यक्तित्व की कल्पना करते हैं. इसे और अधिक गहराई से समझने के लिए विजय दान देथा की कहानी पढ़ें या उस कहानी पर बनी फ़िल्म "पहेली" ध्यान से देखें.

हमजाद पर मेरी नज़र से अभी तक केवल एक किताब गुज़री है जिसका शीर्षक " हमजाद" है. ये असगर वजाहत का उपन्यास है. यदि मिले तो ज़रूर पढ़ें. मुझे स्पाइडर- मेन, सुपरमैन आदि भी प्रकारांतर से उनके रचनाकारों के हमजाद ही लगते हैं.

कई रचनाकारों की रचनाओं में ये हमजाद प्रच्छन्न रूप से मिलता है जैसे निदा फाजली का एक मिसरा- "मेरे ही भीतर रहता है, मेरे जैसा जाने कौन-?" नीरज जी कहते हैं- "तमाम उम्र किसी अजनबी के घर में रहा. सफर न करते हुए भी सफर में रहा." कबीर ने कहा- "साधू आठों जाम बैठो मन ही सों युद्ध करे"

हमजाद कल्पनाशील मन की रचनात्मक उपज है. इसके अस्तित्व, वास्तविकता और स्वरुप पर शंकित होने के स्थान पर इसके सृजनात्मक आयामों के साथ उनके सामाजिक और वैयक्तिक सरोकारों का मूल्यांकन व विश्लेषण किया जाना ज्यादा ज़रूरी है.

श्रद्धेय शरद जी ने कविता में छंद दोष की बात की है. वे वरिष्ठ रचनाकार हैं इस विषय में ज्यादा जानते हैं अतः वे यदि छंद दोषों को सोदाहरण भी बताएं तो नए रचनाकारों का ज्ञान-वर्धन होगा.

मुझे लगता है कि ये रचना वाचिक शैली में है अतः इसमें वाचिक लय है. कविता में छंद भी एक लय की ही प्रतिज्ञा करते हैं अतः यदि वाचिक लय है तो छांदिक-मात्रिक लयात्मकता अधिक महत्वपूर्ण नहीं होती; ऐसा मेरा मानना है. आगे वरिष्ठजनों से मार्गदर्शन की आकांक्षा है

सादर-

आनंदकृष्ण, जबलपुर

मोबाइल : 09425800818